भारत का 'घातक' बनाम चीन का 'जीजे-11': हिमालयी क्षेत्र में स्टील्थ ड्रोन की नई रेस और हमारी सैन्य तैयारी

भारत का 'घातक' बनाम चीन का 'जीजे-11': हिमालयी क्षेत्र में स्टील्थ ड्रोन की नई रेस और हमारी सैन्य तैयारी


तिब्बत का पठार अब दुनिया के लिए केवल एक शांत पहाड़ी क्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि यह अगली पीढ़ी के मानव रहित युद्ध (Unmanned Warfare) का एक बड़ा टेस्टिंग ग्राउंड बन चुका है।

ऊंचाई वाले इलाकों में हवाई मुकाबला, ऑटोनॉमस (स्वचालित) स्ट्राइक और दुश्मन के एयर डिफेंस को चुपचाप भेदने जैसी तकनीकें अब केवल किताबी बातें नहीं हैं। ये भारत-चीन सीमा (LAC) पर दोनों देशों की सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन चुकी हैं।

चीन ने इस दिशा में पहले ही आक्रामक कदम उठा लिए हैं। पीपल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) ने अपने 'जीजे-11 शार्प स्वोर्ड' (जिसे चीनी सेना अब 'मिस्टीरियस ड्रैगन' भी बुलाने लगी है) स्टील्थ लड़ाकू ड्रोन को तिब्बत के शिगात्से (Shigatse) और मालान जैसे रणनीतिक एयरबेस पर तैनात कर दिया है।

यह भारत के लिए एक सीधा संकेत है कि बीजिंग LAC के करीब ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्टील्थ ड्रोन युद्ध की पूरी तैयारी कर चुका है।

लेकिन भारत इसका मूकदर्शक नहीं है। चीन की इन चालों का कड़ा जवाब देने के लिए भारत ने अपना स्वदेशी 'घातक' (Ghatak) स्टील्थ लड़ाकू ड्रोन प्रोग्राम तेजी से आगे बढ़ाया है।

हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत सरकार की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने ₹39,000 करोड़ की लागत से भारतीय वायुसेना के लिए लगभग 60 से 70 (4 स्क्वाड्रन) 'घातक' ड्रोन की खरीद को हरी झंडी दे दी है।

यह एक ऐसा ऐतिहासिक कदम है, जो हिमालय में दोनों देशों के बीच हाई-टेक स्टील्थ युद्ध का नया मैदान तैयार कर रहा है।

तकनीक का खेल: एक जैसी शक्ल, लेकिन इरादे अलग​

पहली नज़र में, चीन का जीजे-11 और भारत का 'घातक' दोनों ही एक जैसी स्टील्थ (छलावरण) तकनीक पर आधारित 'फ्लाइंग विंग' डिजाइन वाले लगते हैं।

इनमें हवाई जहाज की तरह वर्टिकल स्टेबलाइजर (पीछे की पूंछ) नहीं होती, जिससे ये दुश्मन के रडार की तरंगों को वापस नहीं भेजते और उसकी नजरों से बच निकलते हैं।

लेकिन इसके अलावा दोनों की सोच और बनावट में जमीन-आसमान का अंतर है।

चीन का जीजे-11 लगभग 20-टन श्रेणी का एक भारी ड्रोन है। आकार बड़ा होने के कारण चीन ने इसके भीतर दो बड़े वेपन-बे (हथियार रखने की जगह) बनाए हैं, जिनमें 2,000 किलोग्राम तक के प्रिसिजन-गाइडेड बम और मिसाइलें रखी जा सकती हैं।

वहीं, भारत का 'घातक' 13-टन की श्रेणी का ड्रोन है (आकार में लगभग हमारे तेजस फाइटर जेट जितना)। इसमें 1,500 किलोग्राम तक का पेलोड आ सकता है।

लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका ढांचा है, जिसे हल्के कार्बन-कंपोजिट मटेरियल से बनाया जा रहा है ताकि हिमालय की चुनौतीपूर्ण ऊंचाइयों पर यह गजब की फुर्ती और पैंतरेबाजी (Maneuverability) दिखा सके।

इंजन की जंग: रफ्तार बनाम अदृश्यता​

तिब्बत जैसी 14,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर हवा बहुत पतली होती है, जिससे विमान को उड़ने (लिफ्ट) और इंजन को ताकत (थ्रस्ट) पैदा करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

इस माहौल से निपटने के लिए चीन ने अपने जीजे-11 में भारी टर्बोफैन इंजन लगाकर ज्यादा रफ्तार (लगभग 1,000 किमी/घंटा) हासिल करने पर जोर दिया है।

लेकिन सामरिक नजरिए से यह ताकत उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। जब कोई बड़ा इंजन इतनी ऊंचाई पर पूरी ताकत लगाता है, तो वह बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करता है।

आज के समय में हवा में इंफ्रारेड (Infrared) या हीट-सीकिंग (गर्मी को पकड़ने वाली) मिसाइलों का जाल बिछा होता है। जीजे-11 रडार से तो बच सकता है, लेकिन उसके इंजन की प्रचंड गर्मी उसे हमारी आधुनिक मिसाइलों का आसान शिकार बना सकती है।

दूसरी ओर, भारत ने 'घातक' के लिए बहुत ही रणनीतिक और अचूक रास्ता चुना है। यह ड्रोन पूरी तरह स्वदेशी 'कावेरी' इंजन के 'ड्राई' वेरिएंट (बिना आफ्टरबर्नर वाला) पर उड़ेगा।

इसका मतलब है कि यह भले ही चीनी ड्रोन से थोड़ी कम स्पीड से उड़े, लेकिन यह ईंधन कम पीएगा, ज्यादा देर तक हवा में रहेगा और सबसे अहम बात—इसकी हीट सिग्नेचर (गर्मी) न के बराबर होगी।

हिमालय के ठंडे माहौल में यह खूबी इसे चीनी थर्मल और हीट-सेंसरों से पूरी तरह अदृश्य बना देगी।

खुद सोचने वाला हथियार: MUM-T और दुश्मन का खात्मा​

दुनियाभर की सेनाएं अब 'मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग' (MUM-T) की तरफ बढ़ रही हैं, जहाँ लड़ाकू विमान के साथ-साथ ड्रोन की फौज उड़ती है। चीन अपने जीजे-11 को दो सीटों वाले J-20 स्टील्थ फाइटर जेट के साथ जोड़ रहा है, जहाँ पीछे बैठा पायलट ड्रोन को निर्देश देगा।

लेकिन भारत का 'घातक' कार्यक्रम 'ऑटोनॉमस' यानी खुद फैसले लेने की क्षमता पर केंद्रित है। इसमें बेहद उन्नत मिशन कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) लगा है। यह महज रिमोट कंट्रोल से चलने वाला खिलौना नहीं है; यह खुद अपना रास्ता खोज सकता है, पहाड़ों से टकराने से बच सकता है और खुद ही खतरे को पहचान कर हमला कर सकता है।

भारतीय वायुसेना इसे मुख्य रूप से 'सुप्रेशन ऑफ एनिमी एयर डिफेंस' (SEAD) यानी 'दुश्मन के एयर डिफेंस को नष्ट करने' के काम में इस्तेमाल करेगी।

युद्ध की स्थिति में भारत के राफेल, सुखोई या तेजस विमानों के उड़ान भरने से पहले, ये 'घातक' ड्रोन दुश्मन की सीमा में घुसकर चीन के HQ-9 मिसाइल सिस्टम और रडार को तबाह कर देंगे।

भारत के 'स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन' (SAAW) और अत्याधुनिक 'अस्त्र' मिसाइलों से लैस होकर यह ड्रोन पहला और सबसे घातक वार करने के लिए बनाया जा रहा है।

निष्कर्ष: बिना नुकसान के बड़ी जीत​

भारत के लिए 'घातक' का महत्व केवल सैन्य ही नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है।

अगर दुश्मन के इलाके में एयरस्ट्राइक के दौरान हमारा कोई पायलट गिर जाता है या पकड़ा जाता है, तो देश पर भारी मानसिक और कूटनीतिक दबाव आ जाता है।

लेकिन 'घातक' स्टील्थ UCAV भारत को यह सामरिक आज़ादी देता है कि हम अपने बहादुर पायलटों की जान को खतरे में डाले बिना, दुश्मन के डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर की रीढ़ तोड़ सकें।

'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत बन रहा यह स्टील्थ ड्रोन केवल एक मशीन नहीं है; यह इस बात का स्पष्ट संदेश है कि भारत अब आयातित हथियारों के भरोसे नहीं है, बल्कि स्वदेशी तकनीक से हिमालय के आसमान में अपना दबदबा कायम करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
 
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