ITAR की पाबंदियों से GTF संकट तक: जानिए दुनिया की दिग्गज कंपनी 'प्रैट एंड व्हिटनी' भारत के 110 kN AMCA Mk2 फाइटर इंजन प्रोजेक्ट से बाहर क्यों है?

ITAR की पाबंदियों से GTF संकट तक: जानिए दुनिया की दिग्गज कंपनी 'प्रैट एंड व्हिटनी' भारत के 110 kN AMCA Mk2 फाइटर इंजन प्रोजेक्ट से बाहर क्यों है?


भारत अपने पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) मार्क-2 के लिए 110 से 130 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट वाले बेहद शक्तिशाली स्वदेशी इंजन के विकास की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है।

इस महात्वाकांक्षी डिफेंस (Defence) प्रोजेक्ट में साझीदार बनने के लिए फ्रांस की सफरान (Safran), ब्रिटेन की रोल्स रॉयस (Rolls-Royce) और अमेरिका की जीई एयरोस्पेस (GE Aerospace) जैसी ग्लोबल एयरोस्पेस कंपनियों के बीच होड़ मची है।

लेकिन इस रेस से एक नाम पूरी तरह से गायब है— दुनिया की सबसे बेहतरीन मिलिट्री इंजन बनाने वाली अमेरिकी कंपनी, 'प्रैट एंड व्हिटनी' (Pratt & Whitney)।

अमेरिका के F-22 रैप्टर (Raptor) और F-35 लाइटनिंग-2 (Lightning II) जैसे खूंखार स्टेल्थ फाइटर जेट्स को ताकत देने वाली यह कंपनी भारत के AMCA इंजन प्रोग्राम में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखा रही है?

इसका कारण कोई एक नहीं है, बल्कि अमेरिका की सख्त निर्यात नीतियां (Export Controls), कंपनी की अपनी कॉरपोरेट प्राथमिकताएं और कुछ तकनीकी व औद्योगिक चुनौतियां इसका प्रमुख कारण हैं।

आइए इस जटिल एयरोस्पेस रणनीति को आसान भाषा में समझते हैं।

भारत की अटल शर्त: सिर्फ इंजन नहीं, पूरी तकनीक चाहिए​

सबसे बड़ी बाधा वह तकनीक है जिसकी भारत को तलाश है। स्वदेशी 'कावेरी' (Kaveri) इंजन प्रोजेक्ट के लंबे संघर्षों से सबक लेते हुए, भारत सरकार और DRDO अब केवल इंजन खरीदना या लाइसेंस के तहत उसे असेंबल करना नहीं चाहते।

भारत की मांग स्पष्ट है— "नो-हाउ और नो-व्हाई" (Know-how and Know-why)। भारत एक ऐसा साझेदार चाहता है जो 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) करे। इसका मतलब है कि भारत को इंजन के कोर डिजाइन, टर्बाइन ब्लेड की विशेष धातुओं (Metallurgy), अत्यधिक तापमान सहने वाले थर्मल मैनेजमेंट सिस्टम, और रडार को चकमा देने वाले स्टेल्थ सॉफ्टवेयर का पूरा ज्ञान मिले।

प्रैट एंड व्हिटनी (P&W) के लिए भारत की इन कठोर रणनीतिक अपेक्षाओं को पूरा करना लगभग असंभव है।

अमेरिका का ITAR कानून और नेशनल सिक्योरिटी​

P&W के फ्लैगशिप इंजन— F119 (F-22 का इंजन) और F135 (F-35 का इंजन)— में अमेरिका की सबसे गुप्त और संवेदनशील प्रोपल्शन तकनीकें (Propulsion Technologies) इस्तेमाल होती हैं।

ये तकनीकें अमेरिका के कड़े 'इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशंस' (ITAR) और राष्ट्रीय सुरक्षा निर्यात नियंत्रण के तहत सुरक्षित हैं। अमेरिका का इतिहास रहा है कि वह अपने कोर रक्षा बौद्धिक संपदा (Intellectual Property - IP) को किसी भी देश के साथ साझा नहीं करता।

जब तक अमेरिकी सरकार खुद हरी झंडी न दिखाए, P&W चाहकर भी भारत के साथ F119 या F135 जैसी कोर तकनीक साझा नहीं कर सकती, और फिलहाल वाशिंगटन की ओर से ऐसी कोई छूट मिलने के संकेत नहीं हैं।

भारत में GE एयरोस्पेस का पहले से जमा हुआ दबदबा​

अमेरिका-भारत डिफेंस संबंधों में जीई एयरोस्पेस (GE Aerospace) पहले ही बहुत गहरी पैठ बना चुका है। भारत का तेजस मार्क-1 फाइटर GE के F404 इंजन पर उड़ता है, और तेजस मार्क-2 तथा AMCA मार्क-1 के लिए GE F414 इंजन को भारत में ही बनाने का समझौता हो चुका है।

चूंकि GE भारतीय एयरोस्पेस इकोसिस्टम में पहले ही एक स्थापित नाम बन चुका है, इसलिए किसी भी नए अमेरिकी विकल्प के मुकाबले GE को स्वाभाविक बढ़त हासिल है। ऐसे में P&W के लिए भारत में शून्य से शुरुआत कर GE को टक्कर देना एक घाटे का सौदा साबित हो सकता है।

कंपनी का आंतरिक संकट: GTF इंजनों का ग्राउंड होना​

P&W खुद एक भयंकर कॉरपोरेट संकट से जूझ रही है। कंपनी के कमर्शियल विमानों में लगने वाले 'गियर्ड टर्बोफैन' (PW1100G GTF) इंजनों के पुर्जों में पाउडर मेटल (Powdered Metal) की खराबी पाई गई है।

इस खामी के कारण दुनियाभर में एयरबस (Airbus) A320neo विमानों को उड़ान भरने से रोक दिया गया, जिसका भारी असर भारत की इंडिगो (IndiGo) जैसी एयरलाइंस पर भी पड़ा।

इस संकट को सुलझाने के लिए P&W और उसकी मूल कंपनी RTX अपने हजारों इंजीनियरों और अरबों डॉलर के वित्तीय संसाधनों को खर्च कर रही है। जब कंपनी का पूरा फोकस अपने सिविल एविएशन क्राइसिस को सुलझाने पर है, तो वह भारत के साथ एक नया और बेहद जटिल 5th-Gen इंजन प्रोजेक्ट शुरू करने का जोखिम नहीं ले सकती।

F-35 की भारी-भरकम जिम्मेदारियां​

मौजूदा समय में, दुनिया भर में 3,000 से ज्यादा F-35 विमानों का बेड़ा तैयार होने की उम्मीद है। P&W फिलहाल F-35 के इंजन को अपग्रेड करने के लिए 'F135 इंजन कोर अपग्रेड' (ECU) पर भारी निवेश कर रही है।

इतनी बड़ी जिम्मेदारी के बीच, किसी दूसरे देश (भारत) के लिए बिल्कुल नए सिरे से 'क्लीन-शीट' स्टेल्थ इंजन को डिजाइन और को-डेवलप करने के लिए जिस असीमित मैनपावर और समय की जरूरत है, वह P&W के पास नहीं है।

अन्य कंपनियों के आकर्षक ऑफर्स​

प्रैट एंड व्हिटनी की अनुपस्थिति के बीच, यूरोपीय कंपनियों ने भारत के सामने लाल कालीन बिछा दिया है:
  • रोल्स रॉयस (Rolls-Royce): ब्रिटिश कंपनी ने भारत को एक बिल्कुल नए सिरे से डिजाइन (Clean-sheet design) किए गए 110-130 kN इंजन का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने भारत को 100% तकनीक ट्रांसफर, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) पर संयुक्त अधिकार और भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का ऑफर दिया है।
  • सफरान (Safran): फ्रांस की सफरान, जो राफेल के इंजनों का निर्माण करती है, वह भी DRDO की गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) के साथ जॉइंट वेंचर के तहत 120 kN इंजन बनाने की रेस में सबसे आगे चल रही है।

निष्कर्ष​

भारत का AMCA Mk2 प्रोजेक्ट सिर्फ एक फाइटर जेट नहीं, बल्कि एक एयरोस्पेस सुपरपावर बनने की दिशा में भारत की एक बड़ी छलांग है। अब हम केवल खरीदार नहीं, बल्कि सह-निर्माता (Co-developer) बनना चाहते हैं।

प्रैट एंड व्हिटनी तकनीकी रूप से भले ही दुनिया में सिरमौर हो, लेकिन सख्त अमेरिकी निर्यात नीतियां, GE का दबदबा और खुद P&W के आतंरिक संकट मिलकर उसे भारत के इस ऐतिहासिक डिफेंस सफर में शामिल होने से रोक रहे हैं।
 
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