आधुनिक युद्ध का स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। आने वाले समय में जंग केवल जमीन या हवा में पारंपरिक लड़ाकू विमानों से नहीं, बल्कि आसमान में मंडराते हजारों छोटे, सस्ते और बेहद घातक ड्रोन्स के जरिए लड़ी जाएगी।
'सेंटर फॉर लैंड वॉरफेयर स्टडीज' (CLAWS) द्वारा जारी एक नवीनतम और विस्तृत मूल्यांकन ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर एक अहम चेतावनी दी है।
लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) वी.के. सक्सेना द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, यदि भविष्य में भारत को चीन और पाकिस्तान के साथ 'टू-फ्रंट वॉर' (दो मोर्चों वाले युद्ध) का सामना करना पड़ता है, तो हमारी सेनाओं को प्रतिदिन 1,500 से 2,000 समन्वित (coordinated) ड्रोन हमलों के लिए तैयार रहना होगा।
यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि मानव-रहित प्रणालियों का यह विस्फोट किस तरह पारंपरिक और महंगे वायु रक्षा (Air Defence) तंत्र को भेदने की क्षमता रखता है।
ड्रोन: अब केवल 'आंखें' नहीं, बल्कि आसमान के 'पंजे'
हाल ही में भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने भी एक रक्षा सेमिनार में इस नए खतरे की ओर इशारा किया था।उन्होंने स्पष्ट किया कि ड्रोन अब केवल निगरानी करने वाली 'आसमान की आंखें' (Eyes in the sky) नहीं रहे, बल्कि ये आक्रामक और घातक 'आसमान के पंजे' (Claws in the sky) बन चुके हैं।
CLAWS की रिपोर्ट दुश्मनों की ड्रोन क्षमताओं का सटीक मात्रात्मक मूल्यांकन करती है:
- चीन का जखीरा: चीन के पास अत्यधिक आधुनिक टोही-हमलावर (reconnaissance-strike) ड्रोन्स, स्वॉर्म (Swarm) सिस्टम और लंबे समय तक हवा में टिकने वाले लॉइटरिंग म्यूनिशन्स (जिन्हें कामिकेज़ या आत्मघाती ड्रोन भी कहा जाता है) का विशाल नेटवर्क है।
- पाकिस्तान की तैयारी: चीन की मदद से पाकिस्तान भी तेजी से सामरिक (tactical) और आत्मघाती ड्रोन्स की अपनी फ्लीट बढ़ा रहा है।
सैचुरेशन अटैक क्या है? - यह युद्ध की वह रणनीति है जिसमें दुश्मन जानबूझकर इतने अधिक लक्ष्य (जैसे- स्वॉर्म ड्रोन्स) एक साथ भेजता है कि आपकी रक्षा प्रणाली उन्हें ट्रैक करने और नष्ट करने में पूरी तरह थक (saturate) जाए।
हमारी मौजूदा रक्षा प्रणालियों के लिए चुनौती
इन हमलों का सबसे खतरनाक पहलू इनकी भारी संख्या है। हजारों छोटे और सस्ते FPV (फर्स्ट-पर्सन व्यू) ड्रोन्स और विस्फोटकों से लदे झुंडों का मुकाबला करना आर्थिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण है।यदि हमारी सेनाएं मात्र कुछ हजार रुपये के ड्रोन को मार गिराने के लिए करोड़ों रुपये की इंटरसेप्टर मिसाइल दागती हैं, तो कुछ ही दिनों में हमारे महंगे मिसाइल भंडार खाली हो जाएंगे।
रिपोर्ट बताती है कि इस तरह के हमले केवल भौतिक नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि सैन्य कमांडरों पर भारी मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हैं और उन्हें आक्रामक के बजाय 'रक्षणात्मक' (reactive) मुद्रा में धकेल देते हैं।
क्या है भारत का 'डिफेंस' प्लान?
इस खतरे के स्तर को देखते हुए भारत को अपनी सैन्य संरचनाओं में तकनीकी क्रांति लानी होगी। रिपोर्ट में एक मजबूत एंटी-ड्रोन आर्किटेक्चर (Anti-drone architecture) के त्वरित विकास की सिफारिश की गई है।ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) और हालिया सैन्य घटनाक्रमों के अनुसार, भारत इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है:
1. डायरेक्टेड-एनर्जी वेपन्स (DEWs)
भविष्य के ड्रोन हमलों से निपटने का सबसे कारगर उपाय मिसाइलें नहीं, बल्कि लेजर और माइक्रोवेव हथियार हैं।DRDO द्वारा विकसित किए जा रहे 'सूर्या' लेजर वेपन और हाई-पावर माइक्रोवेव (HPM) सिस्टम जैसे हथियार इस दिशा में गेम-चेंजर हैं। ये हथियार बिना किसी गोली या बारूद के, केवल ऊर्जा की तेज किरणों से ड्रोन्स के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट को पल भर में भून सकते हैं।
इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनसे एक ड्रोन को गिराने का खर्च मात्र 1 डॉलर (लगभग 85 रुपये) से भी कम आता है।
2. मिशन सुदर्शन चक्र
भारत ने हाल ही में 'मिशन सुदर्शन चक्र' को गति दी है, जो 2035 तक देश भर में एक AI-संचालित, बहु-स्तरीय (multi-layered) रक्षा कवच तैयार करेगा।इसमें थल सेना, वायु सेना और नौसेना के बीच रीयल-टाइम जानकारी साझा करने के लिए एक निर्बाध नेटवर्क स्थापित किया जा रहा है।
3. लेयर्ड डिफेंस और स्वदेशी उत्पादन
रिपोर्ट जोर देती है कि हमें काइनेटिक इंटरसेप्टर्स (गोला-बारूद), जेमिंग प्रणालियों और लेजर हथियारों का एक संयुक्त 'लेयर्ड डिफेंस' तैयार करना होगा। इसके लिए देश के भीतर सस्ते और प्रभावी काउंटर-ड्रोन (C-UAS) सिस्टम का बड़े पैमाने पर स्वदेशी उत्पादन अनिवार्य है।भारत ने पहले ही ड्रोन रूल्स और भारतीय सेना की नई 'ड्रोन रेजिमेंट्स' के साथ अपनी कमर कस ली है। लेकिन CLAWS की यह रिपोर्ट हमारी सेनाओं और रक्षा (defence) अनुसंधान के लिए एक कड़ा रिमाइंडर है— भारत को अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए इस नई तकनीक में दुश्मन से दो कदम आगे रहना ही होगा।