AMCA फाइटर जेट: रोल्स-रॉयस का सबसे बड़ा दांव, भारत को 100% तकनीक के साथ 120kN इंजन बनाने का ऐतिहासिक ऑफर

AMCA फाइटर जेट: रोल्स-रॉयस का सबसे बड़ा दांव, भारत को 100% तकनीक के साथ 120kN इंजन बनाने का ऐतिहासिक ऑफर


आत्मनिर्भर भारत के सैन्य इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। ब्रिटिश एयरोस्पेस दिग्गज रोल्स-रॉयस (Rolls-Royce) ने भारत के सबसे महत्वाकांक्षी रक्षा प्रोजेक्ट—एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA)—में एक प्रमुख भूमिका निभाने के लिए अब तक का अपना सबसे मजबूत प्रस्ताव पेश किया है।

कंपनी ने भारत के साथ मिलकर 120 किलोन्यूटन (kN) से अधिक 'थ्रस्ट' क्षमता वाले एक अत्याधुनिक फाइटर जेट इंजन को डिजाइन, विकसित और निर्माण करने की पेशकश की है। सबसे अहम बात यह है कि इस प्रस्ताव में 100% तकनीकी हस्तांतरण (Transfer of Technology - ToT) का वादा किया गया है।

भारत के पांचवीं पीढ़ी (5th-Generation) के स्टील्थ फाइटर प्रोग्राम के लिए एक ताकतवर स्वदेशी इंजन की तलाश अब अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर है।

इस रेस में अब मुख्य रूप से रोल्स-रॉयस और फ्रांस की सफरान (Safran) के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला है।

यह सिर्फ एक रक्षा सौदा नहीं है, बल्कि एक ऐसा फैसला है जो आने वाले कई दशकों के लिए भारत की 'एयरो-इंजन' क्षमताओं की दिशा और सामरिक स्वायत्तता तय करेगा।

ऑफर के मूल में क्या है? (तकनीक को समझें)​

रोल्स-रॉयस के इस प्रस्ताव के केंद्र में एक बेहद स्पष्ट और समयबद्ध रोडमैप है। कंपनी का कहना है कि यदि 2026 के अंत तक इस सौदे पर हस्ताक्षर हो जाते हैं, तो नए इंजन के 'कोर' और 'हॉट सेक्शन' (इंजन का वह धधकता हुआ मुख्य हिस्सा जहाँ ईधन जलता है और अधिकतम ऊर्जा पैदा होती है) का परीक्षण 2030 तक शुरू हो सकता है।

ओपन-सोर्स रिपोर्ट्स के मुताबिक, रोल्स-रॉयस का लक्ष्य 2032 तक इन इंजनों के ग्राउंड ट्रायल और 2034 तक इंजन की पहली उड़ान पूरी करने का है। इसके बाद 2036 तक यह पूर्ण रूप से बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार हो जाएगा। यह एक बिल्कुल नई डिजाइन होगी जो किसी भी पुराने इंजन की कॉपी नहीं होगी।

यह टाइमलाइन भारत के AMCA Mk2 (विमान के दूसरे चरण) के विजन के साथ बिल्कुल सटीक बैठती है। पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स अपनी 'स्टील्थ' (दुश्मन के रडार से छुपने की क्षमता) के लिए जाने जाते हैं, जिसके लिए हथियारों को विमान के अंदर (Internal Weapons Bay) रखना पड़ता है।

120kN का भारी-भरकम इंजन AMCA को अतिरिक्त पेलोड (हथियार और बम) ले जाने, लंबी दूरी तक उड़ान भरने और घातक सेंसर को ऊर्जा देने के लिए जरूरी शक्ति प्रदान करेगा, वह भी विमान की रडार से बचने की क्षमता से समझौता किए बिना।

बौद्धिक संपदा (IP) का अधिकार: क्यों है यह एक 'गेम चेंजर'?​

रोल्स-रॉयस की पेशकश की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) यह है कि यह किसी पुरानी तकनीक का 'लाइसेंस उत्पादन' नहीं है। कंपनी भारत में इंजन डिजाइन, विकास, निर्माण से लेकर मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) का पूरा इकोसिस्टम स्थापित करने के लिए तैयार है।

रक्षा तकनीक में भारत की सबसे बड़ी चिंता हमेशा से यही रही है कि विदेशी कंपनियां तकनीक तो देती हैं, लेकिन उसका 'दिमाग' यानी मुख्य डिज़ाइन और 'बौद्धिक संपदा' (IP) का अधिकार अपने पास रखती हैं। इससे भविष्य में अपने हिसाब से बदलाव करने की आज़ादी छिन जाती है।

रोल्स-रॉयस का दावा है कि इस प्रोग्राम के तहत विकसित तकनीक पर पूरी तरह से भारत का अधिकार होगा। इसका मतलब है कि हमारे वैज्ञानिक भविष्य में किसी भी विदेशी पाबंदी की चिंता किए बिना इस इंजन को अपग्रेड कर सकेंगे।

रोल्स-रॉयस के भारत में कार्यकारी उपाध्यक्ष, शशि मुकुंदन ने स्पष्ट किया कि दुनिया में केवल कुछ ही कंपनियों के पास शुरुआत से लेकर अंत तक फाइटर इंजन डिजाइन करने की असली क्षमता है। उनका यह बयान सीधे तौर पर फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्वी सफरान (Safran) के लिए एक खुली चुनौती माना जा रहा है।

AMCA इंजन की दो-चरणों वाली रणनीति​

वर्तमान में, AMCA के पहले चरण (Phase 1) में बनने वाले विमान अमेरिकी GE F414 इंजन से उड़ान भरेंगे। (यह वही इंजन है जिसे भारत के तेजस Mk2 के लिए चुना गया है)। लेकिन भविष्य के उन्नत वेरिएंट (Phase 2) के लिए 120kN क्लास के शक्तिशाली स्वदेशी इंजन की सख्त आवश्यकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि AMCA विमान जितना महत्वपूर्ण है, उसका स्वदेशी इंजन भी उतना ही सामरिक महत्व रखता है।

भारत ने विमान डिजाइन, रडार विकास और हथियारों को जोड़ने में महारत हासिल कर ली है, लेकिन एक लड़ाकू विमान का इंजन बनाना अभी भी देश की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती बनी हुई है।

इस प्रोजेक्ट की सफलता भारतीय सैन्य उड्डयन में एक महाशक्ति बनने की दिशा में एक बड़ी छलांग होगी।

भारत को 'ग्लोबल हब' बनाने का विजन​

रोल्स-रॉयस इस सौदे को सिर्फ एक सैन्य प्रोजेक्ट के रूप में नहीं, बल्कि एक औद्योगिक विजन के रूप में पेश कर रहा है। कंपनी भारत को ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी के बाद अपना चौथा वैश्विक 'प्रोपल्शन हब' बनाना चाहती है। ऐसा हब न केवल सैन्य विमानों बल्कि नागरिक उड्डयन, नौसेना के जहाजों और जमीन पर ऊर्जा समाधानों के लिए भी काम करेगा।

इस समय त्वरित निर्णय लेना बेहद अहम है। स्वदेशी इंजन कार्यक्रम में किसी भी तरह की देरी भारत की आयातित इंजनों पर निर्भरता बढ़ा सकती है। हालाँकि मौजूदा GE-HAL समझौता अहम है, लेकिन रक्षा विश्लेषक इसे 'स्वतंत्र इंजन डिज़ाइन क्षमता' के बजाय एक 'उत्पादन साझेदारी' के रूप में ही देखते हैं।

भारत अब जब अपने इस ऐतिहासिक और सामरिक रूप से अहम एयरोस्पेस प्रोग्राम के लिए एक साथी चुनने के करीब है, तो रोल्स-रॉयस और सफरान के बीच यह चुनाव केवल तकनीकी प्रदर्शन या लागत पर निर्भर नहीं करेगा।

यह इस बात पर तय होगा कि कौन सी कंपनी भारत को 'संपूर्ण तकनीकी हस्तांतरण', 'IP अधिकार' और एक सच्चा 'स्वदेशी फाइटर इंजन इकोसिस्टम' स्थापित करने में सबसे अधिक मदद करती है।
 

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