सिद्धारमैया पर नारायणस्वामी का बड़ा आरोप: मदिगा समुदाय के 35 साल के आंतरिक आरक्षण संघर्ष से विश्वासघात, दलित भी गुमराह

सीएम सिद्धारमैया ने मदिगा समुदाय से विश्वासघात किया: नारायणस्वामी


बेंगलुरु, 27 फरवरी। राज्य सरकार की आलोचना करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता ए नारायणस्वामी ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 35 वर्षों से आंतरिक आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे मदिगा समुदाय के साथ विश्वासघात किया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि केवल मदिगा ही नहीं, बल्कि राज्यभर के दलितों को भी गुमराह किया गया है। उनका कहना था कि आंतरिक आरक्षण के मुद्दे पर 101 जातियों को भ्रमित किया गया और नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं को भी सरकार ने गलत जानकारी दी।

नारायणस्वामी ने कहा कि तमिलनाडु ने अनुच्छेद 9 के तहत 69 प्रतिशत आरक्षण लागू कर वंचित समुदायों को मजबूत समर्थन दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कर्नाटक की कांग्रेस-नेतृत्व वाली सरकार ने आंतरिक आरक्षण के मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी ढंग से पैरवी करने में रुचि और इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि सर्वेक्षण और आयोगों की रिपोर्ट पर सार्वजनिक धन खर्च कर किसके हित साधे जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक वर्ष बाद भी आंतरिक आरक्षण पर चर्चा न होने को उन्होंने सरकार की विफलता बताया।

उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति सदाशिव, मधुस्वामी और न्यायमूर्ति नागमोहन दास की रिपोर्टों को खारिज कर सरकार ने आंतरिक आरक्षण को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा की है। हालांकि विधानसभा में विधेयक पारित कर राज्यपाल को भेजा गया, लेकिन मामला अब तक लंबित है।

नारायणस्वामी ने मांग की कि यदि मुख्यमंत्री, दलित मंत्री और अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों से चुने गए 54 विधायक वास्तव में दलितों के प्रति प्रतिबद्ध हैं, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति से 54 विधायक होने के बावजूद वे इस मुद्दे पर मौन हैं।

उन्होंने पूछा कि दलित मंत्री कैबिनेट बैठकों में अपनी आवाज क्यों नहीं उठा रहे और यदि वे बोल नहीं सकते तो मंत्री पद पर क्यों बने हुए हैं। उन्होंने आंदोलन शुरू करने की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की।

उन्होंने कहा कि राज्य में लगभग 2.8 लाख सरकारी पद रिक्त हैं और नौकरी के इच्छुक युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किया है। आरोप लगाया कि हालिया कैबिनेट बैठक में सरकार ने पुरानी आरक्षण प्रणाली को बहाल करने का निर्णय लेकर दलितों और आंदोलनरत युवाओं को गुमराह किया।

नारायणस्वामी ने कहा कि यदि सरकार सामाजिक न्याय के प्रति सचमुच प्रतिबद्ध होती, तो वह इंद्रा साहनी मामले में बताए अनुसार 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा से कानूनी रूप से आगे बढ़ सकती थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां क्रमशः 58 और 57 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया है, जबकि कर्नाटक सरकार अदालत में मजबूत दलीलें पेश करने में विफल रही।

उन्होंने कहा कि मदिगा समुदाय और उसकी उपजातियां, जो दशकों से सबसे अधिक वंचित रही हैं, आंतरिक आरक्षण के लिए संघर्ष कर रही हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कांग्रेस ने सत्ता में आने पर आंतरिक आरक्षण लागू करने का वादा किया था।

उन्होंने मुख्यमंत्री पर सामाजिक न्याय के पैरोकार के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया। साथ ही, 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि इस निर्णय ने सरकारों को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए आंतरिक आरक्षण और विशेष प्रावधान करने का अधिकार दिया है, जो डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान की भावना के अनुरूप है।
 

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