एआई से 2050 तक खत्म हो सकती हैं पारंपरिक नौकरियां: विनोद खोसला

एआई से 2050 तक खत्म हो सकती हैं पारंपरिक नौकरियां: विनोद खोसला


नई दिल्ली, 17 फरवरी। भारतीय मूल के अमेरिकी उद्यमी और वेंचर कैपिटलिस्ट विनोद खोसला ने मंगलवार को बड़ा दावा करते हुए कहा कि वर्ष 2050 तक लोगों को शायद पारंपरिक नौकरियों की जरूरत ही न पड़े। उनका मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तेजी से हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है और यह रोजगार की प्रकृति को पूरी तरह बदल सकता है।

'इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026' में बोलते हुए खोसला ने कहा कि आने वाले दशकों में एआई सिस्टम और ज्यादा शक्तिशाली और सक्षम हो जाएंगे, जिससे नौकरियों का भविष्य पूरी तरह बदल जाएगा। उन्होंने कहा कि 2025 तक यह साफ दिखने लगेगा कि पारंपरिक रोजगार ढांचा तेजी से बदल रहा है।

सिलिकॉन वैली के निवेशक खोसला ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बड़ी संख्या में व्हाइट-कॉलर नौकरियों को खत्म कर सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि आईटी सर्विस और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) कंपनियां अगले पांच वर्षों में लगभग पूरी तरह गायब हो सकती हैं।

उन्होंने दोहराया कि 2030 तक आउटसोर्सिंग उद्योग खत्म हो सकता है। खोसला के मुताबिक, भारत में अब भी कई लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि एआई आईटी सेक्टर पर बड़ा असर डालेगा, लेकिन तकनीक की तेज प्रगति उन उद्योगों को भी प्रभावित करेगी, जो अब तक देश की आर्थिक वृद्धि का आधार रहे हैं।

खोसला ने बड़ी कंपनियों में 15 से 20 साल तक लगातार काम करने की प्रवृत्ति की भी आलोचना की। उनका कहना है कि तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया में लंबे समय तक एक ही संस्था में काम करने से पेशेवरों की अनुकूलन क्षमता कम हो सकती है। ऐसे लोग बदलते उद्योग वातावरण में कम लचीले हो जाते हैं।

हालांकि, चेतावनियों के बीच खोसला ने भारत की एआई पहल की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट बेहद सफल रहा है और इसमें तीन लाख से ज्यादा लोगों ने पंजीकरण कराया है।

उन्होंने 'सॉवरेन एआई' मॉडल का समर्थन करते हुए कहा कि देशों को खासकर साइबर सुरक्षा और रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए अपने एआई सिस्टम विकसित करने चाहिए, न कि विदेशी मॉडल पर निर्भर रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारत की एआई महत्वाकांक्षाओं को समर्थन देने के लिए उन्होंने 'सर्वम' में निवेश किया है।
 

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