संसद में गरजे सांसद: सामाजिक न्याय पर आए वार्षिक रिपोर्ट, बने देश के लिए 'रणनीतिक मार्गदर्शक'

राज्यसभा सरकार से की मांग, सामाजिक न्याय पर लाई जाए वार्षिक रिपोर्ट


नई दिल्ली, 10 फरवरी (आईएएनएस) राज्यसभा में सरकार से अपील की गई है कि भारत में सामाजिक न्याय की स्थिति पर एक वार्षिक रिपोर्ट को संस्थागत रूप दिया जाए। कांग्रेस सांसद मुकुल वासनिक ने मंगलवार को यह मुद्दा उठाया।

उन्होंने सामाजिक न्याय को एक गंभीर और व्यापक विषय बताते हुए कहा कि जिस तरह केंद्रीय बजट से एक दिन पहले आर्थिक सर्वेक्षण सदन के पटल पर रखा जाता है, उसी तरह सामाजिक न्याय पर आधारित एक डेटा-आधारित रिपोर्ट भी हर वर्ष संसद में प्रस्तुत की जानी चाहिए, ताकि उस पर संसद के भीतर और बाहर सार्थक चर्चा हो सके।

मुकुल वासनिक ने कहा कि यह रिपोर्ट संविधान में निहित समानता और समावेशन जैसे मूल्यों को मजबूत करने के लिए एक रणनीतिक मार्गदर्शक के रूप में काम करे। इसके तहत सामाजिक न्याय से जुड़े मौजूदा कानूनों और नीतिगत ढांचों की व्यवस्थित समीक्षा होनी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हैं और वंचित वर्गों को वास्तविक न्याय दिला पा रहे हैं या नहीं।

उन्होंने सुरक्षा के मुद्दे को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं और अन्य कमजोर वर्गों के जीवन और गरिमा की रक्षा के लिए बनी योजनाओं और कानूनों के क्रियान्वयन की गंभीर जांच होनी चाहिए। एससी, एसटी और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अत्याचारों के साथ-साथ लिंचिंग की घटनाओं को इस प्रस्तावित रिपोर्ट के केंद्र में रखा जाना चाहिए।

उन्होंने अमानवीय मैला सफाई की प्रथा का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि आखिर कब तक लोग मैनहोल में उतरकर नालियां साफ करने को मजबूर होंगे और कब तक समाज ऐसे हादसों में होने वाली मौतों का मूकदर्शक बना रहेगा। उन्होंने इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता बताते हुए तत्काल समाधान की मांग की। कांग्रेस सांसद ने वित्तीय जवाबदेही पर भी जोर दिया और कहा कि बजट में किए गए आवंटनों, आरक्षण और वंचित वर्गों के सशक्तीकरण के लिए चलाई जा रही योजनाओं के वास्तविक प्रभाव का गहराई से विश्लेषण किया जाना चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब नीतियां मौजूद हैं तो फिर उनका लाभ सही स्तर तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है। सामाजिक और आर्थिक असमानताओं की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा, रोजगार, औसत आय और गरीबी के स्तर में विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच आज भी गहरी खाइयां मौजूद हैं। उन्होंने पूछा कि आरक्षित श्रेणियों में नियुक्तियों का बड़ा बैकलॉग अब तक क्यों बना हुआ है और वंचित वर्गों के बच्चों की शैक्षिक स्थिति में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हो पाया है।

मुकुल वासनिक ने आवश्यक सेवाओं के मुद्दे पर कहा कि स्वास्थ्य, आवास और बुनियादी सुविधाओं की क्षेत्रवार गुणवत्ता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग आज भी पर्याप्त सेवाओं से वंचित रह जाते हैं, जबकि विकास का दावा किया जाता है।

उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक समावेशन को भी इस रिपोर्ट का अहम हिस्सा बताया। उनके अनुसार, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, महिलाएं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की राजनीतिक भागीदारी का आकलन करना चाहिए। मतदान से लेकर निर्वाचित पदों तक का आकलन किया जाना चाहिए और सामाजिक गतिशीलता में बाधा डालने वाली संरचनात्मक समस्याओं की पहचान की जानी चाहिए। उन्होंने दिव्यांगजनों की सुगम्यता को भी इसमें शामिल करने की आवश्यकता बताई।

अपने वक्तव्य के अंत में मुकुल वासनिक ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के शब्दों को दोहराते हुए कहा कि यदि हम लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता से इनकार करते रहेंगे, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि सामाजिक न्याय को केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा न मानकर ठोस नीतियों, पारदर्शी आंकड़ों और वास्तविक जवाबदेही के साथ लागू किया जाए।
 

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