सोशल मीडिया पोस्ट पर मनमानी FIR और गिरफ्तारी नहीं! कर्नाटक सरकार ने जारी किए नए नियम, जानें क्या हैं गाइडलाइंस

सोशल मीडिया पोस्ट पर एफआईआर दर्ज करने को लेकर कर्नाटक सरकार की नई गाइडलाइंस


बेंगलुरु, 9 फरवरी। कर्नाटक सरकार ने सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े मामलों में एफआईआर के स्वतः पंजीकरण और गिरफ्तारी पर रोक लगाने के उद्देश्य से नई गाइडलाइंस जारी की हैं। ये दिशा-निर्देश पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक (डीजी व आईजीपी) द्वारा जारी एक आधिकारिक सर्कुलर के जरिए लागू किए गए हैं।

डीजी और आईजीपी एम.ए. सलीम द्वारा हस्ताक्षरित सर्कुलर में कहा गया है कि यह देखा गया है कि कई मामलों में पुलिस अधिकारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रारंभिक जांच किए बिना ही सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े मामलों में यांत्रिक रूप से केस दर्ज कर रहे हैं। सर्कुलर में कहा गया है कि शीर्ष अदालत ने सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में एफआईआर दर्ज करने को लेकर तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा तय गाइडलाइंस को भी मान्यता दी है।

नई गाइडलाइंस के तहत शिकायतकर्ता की लोकस स्टैंडी (कानूनी पात्रता) की जांच, संज्ञेय अपराधों में प्रारंभिक जांच, मीडिया या अभिव्यक्ति से जुड़े मामलों में उच्च मानक, राजनीतिक अभिव्यक्ति की सुरक्षा, मानहानि को गैर-संज्ञेय अपराध के रूप में मान्यता, गिरफ्तारी से जुड़े तय प्रोटोकॉल का पालन, संवेदनशील मामलों में पूर्व कानूनी समीक्षा और दुर्भावनापूर्ण या प्रेरित शिकायतों पर रोक जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं।

सर्कुलर में स्पष्ट किया गया है कि कथित मानहानि या इसी तरह के अपराधों में एफआईआर दर्ज करने से पहले यह जांच अनिवार्य होगी कि शिकायतकर्ता कानून के तहत “पीड़ित व्यक्ति” की श्रेणी में आता है या नहीं। असंबंधित तीसरे पक्ष द्वारा की गई शिकायतें स्वीकार्य नहीं होंगी, सिवाय इसके कि मामला किसी संज्ञेय अपराध से जुड़ा हो। साथ ही, किसी भी अपराध को दर्ज करने से पहले पुलिस को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रारंभिक जांच करनी होगी कि आरोपित अपराध के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया मौजूद हैं या नहीं।

दिशा-निर्देशों में यह भी कहा गया है कि वैमनस्य फैलाने, जानबूझकर अपमान, सार्वजनिक उपद्रव, सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा या देशद्रोह जैसे आरोपों में तब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया जाएगा, जब तक कि हिंसा, घृणा या सार्वजनिक अशांति भड़काने से जुड़ा ठोस प्रारंभिक साक्ष्य मौजूद न हो।

सर्कुलर में कहा गया है कि कठोर, आपत्तिजनक या आलोचनात्मक राजनीतिक भाषण को लेकर पुलिस को यांत्रिक रूप से मामले दर्ज नहीं करने चाहिए। केवल तभी आपराधिक कानून लागू किया जा सकता है, जब ऐसी अभिव्यक्ति हिंसा के लिए उकसावे या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए तात्कालिक खतरा पैदा करती हो। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत मुक्त राजनीतिक आलोचना की सुरक्षा का पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए।

चूंकि मानहानि एक गैर-संज्ञेय अपराध है, इसलिए पुलिस को ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करने का अधिकार नहीं है। गाइडलाइंस के अनुसार, शिकायतकर्ताओं को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाएगा। पुलिस केवल तभी कार्रवाई कर सकेगी, जब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 174(2) के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाएं।
 

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