जंगल की आग से हालात बेकाबू! NGT का केंद्र और राज्यों को सख्त नोटिस, रोकथाम के लिए माँगे व्यापक दिशा-निर्देश

बढ़ती जंगल की आग की घटनाओं पर एनजीटी ने केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया


नई दिल्ली, 8 फरवरी। देशभर में जंगल की आग की बढ़ती घटनाओं को लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और कई वैधानिक प्राधिकरणों को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस जंगल की आग की रोकथाम और प्रबंधन के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।

एनजीटी की पीठ की अध्यक्षता चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव ने की, जबकि विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल भी पीठ में शामिल थे। पीठ ने उस मूल आवेदन पर सुनवाई की, जिसमें खासतौर पर हिमालय और पश्चिमी घाट जैसे पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में जंगल की आग की घटनाओं में “तेजी से और चिंताजनक” वृद्धि की ओर ध्यान दिलाया गया है।

याचिकाकर्ता ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश देने की मांग की है कि वह राष्ट्रीय वन अग्नि कार्य योजना (नेशनल एक्शन प्लान ऑन फॉरेस्ट फायर) के क्रियान्वयन, राष्ट्रीय अग्नि अलर्ट एवं नियंत्रण प्रणालियों की कार्यप्रणाली, तथा वन अग्नि रोकथाम योजनाओं के तहत जारी और उपयोग किए गए धन की स्थिति पर समयबद्ध रिपोर्ट दाखिल करे।

याचिका में देशभर के लिए एक समग्र फायर-रिस्क गवर्नेंस फ्रेमवर्क बनाने की भी मांग की गई है। इसमें वैज्ञानिक आधार पर आग के जोखिम वाले क्षेत्रों का जोन निर्धारण, प्राथमिकता आधारित मौसमी कार्य योजनाओं की तैयारी और जंगल की आग की रोकथाम, पहचान, त्वरित प्रतिक्रिया और आग के बाद पुनर्बहाली के लिए एक समान अखिल भारतीय मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) शामिल है।

इसके अलावा राज्य वन विभागों की जमीनी तैयारियों को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। इसमें फायर लाइन और वॉच टावरों का रखरखाव, प्रशिक्षित फायर वॉचरों और त्वरित प्रतिक्रिया टीमों की तैनाती, आधुनिक अग्निशमन उपकरणों और निगरानी तकनीकों का उपयोग तथा जिला स्तर पर वन अग्नि संकट प्रबंधन तंत्र की स्थापना की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, जंगल की आग से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। इससे जैव विविधता का नुकसान, वन कार्बन सिंक का विनाश, मिट्टी और जलग्रहण प्रणालियों को क्षति, वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि हो रही है।

याचिका में जनवरी 2026 में सामने आई हालिया घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें हिमाचल प्रदेश में त्रिउंड ट्रेकिंग रूट पर लगी आग, पश्चिमी घाट में समय से पहले शुरू हुई जंगल की आग और उत्तराखंड में बर्फ की कमी व शुष्क सर्दियों के बीच लगी आग शामिल हैं।

इसके अलावा आरटीआई के जरिए प्राप्त आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि महाराष्ट्र में जनवरी से सितंबर 2025 के बीच जंगल की आग के 8,091 मामले दर्ज किए गए, जो 2024 की कुल घटनाओं की तुलना में 56 प्रतिशत अधिक हैं। इनमें से अधिकांश घटनाएं गढ़चिरौली, चंद्रपुर और अमरावती जिलों से रिपोर्ट की गईं।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कुणाल टंडन ने दलील दी कि एनजीटी द्वारा वर्ष 2019 में जंगल की आग के प्रबंधन को लेकर जारी किए गए निर्देशों के बावजूद, संबंधित एजेंसियां जमीनी स्तर पर उनका प्रभावी पालन सुनिश्चित करने में विफल रही हैं। उन्होंने राष्ट्रीय वन अग्नि प्रबंधन परियोजना के प्रारंभिक ढांचे का भी हवाला देते हुए इसके क्रियान्वयन में खामियों की ओर इशारा किया।

नोटिस जारी करते हुए अधिकरण ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह सभी प्रतिवादियों को याचिका की प्रतियां उपलब्ध कराए और अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले सेवा का हलफनामा दाखिल करे। इस मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल को होगी।
 

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