अलप्पुझा, 12 मार्च। अंबालाप्पुझा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव लड़ने के संकेत देने के बाद वरिष्ठ नेता जी सुधाकरन के खिलाफ माकपा ने गुरुवार को पहली बार कड़ी प्रतिक्रिया दी। छह दशकों से अधिक समय तक पार्टी से जुड़े रहे सुधाकरन के इस फैसले से केरल की राजनीति में हलचल बढ़ गई है।
अलप्पुझा जिले के सीपीआई(एम) सचिव आर नजर ने कहा कि अंबालाप्पुझा में पार्टी उम्मीदवार बदले जाने के बाद भी संगठन ने पूर्व मंत्री सुधाकरन के साथ काफी सम्मानजनक व्यवहार किया था।
नजर के मुताबिक, पार्टी ने उन्हें पूरा सम्मान और दर्जा दिया और यहां तक कि जिला कार्यालय में उनके लिए एक विशेष कमरा भी आवंटित किया गया था। उन्होंने कहा कि सुधाकरन के अनुरोध पर उन्हें नवगठित शाखा समिति में भी शामिल किया गया था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद ही पार्टी से दूरी बनानी शुरू कर दी।
उन्होंने बताया कि जब यह खबर सामने आई कि सुधाकरन पार्टी की सदस्यता नवीनीकरण नहीं कर सकते हैं, तो वरिष्ठ नेताओं ने व्यक्तिगत रूप से उनसे मुलाकात कर उन्हें मनाने की कोशिश की थी।
नजर ने कहा, “पार्टी ने हमेशा उन्हें शहीद के भाई के रूप में भी विशेष सम्मान दिया है। इस घोषणा के बाद भी हमें उम्मीद है कि वे अपने फैसले पर पुनर्विचार करेंगे।”
पार्टी के महासचिव और सुधाकरन के पूर्व कैबिनेट सहयोगी एमए बेबी ने भी इस घटनाक्रम को “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण” बताया।
वहीं राज्य के मंत्री साजी चेरियन ने कहा कि चुनाव लड़ना सुधाकरन का व्यक्तिगत फैसला है, लेकिन इससे अलप्पुझा में पार्टी पर “जरा भी असर नहीं पड़ेगा।” उन्होंने यह भी कहा कि सीपीआई(एम) ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे सुधाकरन को पार्टी छोड़ने का औचित्य मिलता हो।
इस बीच, सुधाकरन के गृह क्षेत्र पुन्नाप्रा में उनके फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए पोस्टर लगाए गए हैं। इन पोस्टरों में उन्हें “वर्ग गद्दार” बताया गया है और लिखा गया है कि उनके लिए “न माफी, न वोट।” माना जा रहा है कि ये पोस्टर पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए हैं, जो उनके खिलाफ जमीनी स्तर पर अभियान की शुरुआत का संकेत हैं।
सुधाकरन की घोषणा से अंबालाप्पुझा की राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आया है, जिसे लंबे समय से सीपीआई(एम) का गढ़ माना जाता रहा है।
हालांकि पार्टी नेतृत्व का कहना है कि इस क्षेत्र के मतदाता किसी व्यक्ति के बजाय पार्टी की विचारधारा और चुनाव चिह्न का समर्थन करते हैं।
अलप्पुझा, कन्नूर के बाद, सीपीआई(एम) के सबसे मजबूत संगठनात्मक गढ़ों में से एक माना जाता है। हालांकि यहां अतीत में गुटबाजी भी देखी गई है और पूर्व मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन जैसे बड़े नेताओं को भी आंतरिक मतभेदों के बीच विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था।
कभी अच्युतानंदन के करीबी माने जाने वाले और बाद में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के समर्थक बने सुधाकरन ने हाल ही में आरोप लगाया था कि पार्टी में उन्हें जानबूझकर हाशिये पर धकेला जा रहा है।
संगठन से दूरी बनाने के बावजूद सुधाकरन का कहना है कि वे अब भी कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हैं और उनका निर्दलीय चुनाव लड़ना पार्टी के मौजूदा रुझानों के खिलाफ एक विरोध है।