हिमालय की गोद में डोडीताल: वो अलौकिक धाम जहाँ माता पार्वती ने रचा था गणेश को, अद्भुत सौंदर्य

हिमालय की गोद में बसा डोडीताल, जहां से जुड़ी है भगवान गणेश के पुनर्जन्म की कहानी


उत्तरकाशी, 11 मार्च। हिमालय की गोद में बसी डोडीताल झील सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं बल्कि धार्मिक आस्था और पौराणिक महत्व के लिए भी खास मानी जाती है। इसे भगवान गणेश का जन्मस्थान माना जाता है। इसके आसपास की वादियां, बर्फ से ढके जंगल और पहाड़ इस स्थल को और भी खास बना देते हैं।

डोडीताल झील के पास एक प्राचीन गणेश मंदिर स्थित है, जहां भगवान गणेश माता पार्वती (अन्नपूर्णा के रूप में) के साथ विराजमान हैं। इसके आसपास की वादियां, बर्फ से ढके जंगल और पहाड़ इस स्थल को और भी अलौकिक बना देते हैं। सर्दियों में जब झील और आसपास का क्षेत्र बर्फ की सफेदी में ढक जाता है, तो पूरा दृश्य ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने यहां अपना सबसे शांतिपूर्ण और दिव्य रूप सजाया हो।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, उत्तराखंड का डोडीताल वही पावन स्थल है जहां माता पार्वती ने अपने उबटन से भगवान गणेश की रचना की थी। कथा के अनुसार, माता पार्वती जब स्नान कर रही थीं, तब उन्होंने बालक गणेश को द्वारपाल के रूप में नियुक्त कर किसी को भी भीतर न आने देने का आदेश दिया। इसी बीच जब भगवान शिव वहां पहुंचे, तो अपने पिता के परिचय से अनजान बालक गणेश ने उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक दिया।

इस हठ से क्रोधित होकर महादेव ने बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती के विलाप और दुःख को देखकर भगवान शिव ने उन्हें पुनर्जीवित करने का वचन दिया और गणेश जी के धड़ पर गज (हाथी) का मुख लगाकर उन्हें पुनः जीवित किया।

डोडीताल झील समुद्र तल से लगभग 3,024 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। झील का पानी क्रिस्टल की तरह साफ और नीला है, जिसमें हिमालयन गोल्डन ट्राउट मछलियां पाई जाती हैं। चारों ओर बर्फ से ढकी चोटियां, घने जंगल और अल्पाइन घास के मैदान इस जगह को जैसे किसी स्वर्ग में बदल देते हैं। यहां आने वाले लोग न सिर्फ हिमालय की सुंदरता को निहारते हैं, बल्कि भगवान गणेश की कथा और उनके पुनर्जन्म की पौराणिक गाथा को भी महसूस कर पाते हैं।
 

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