नौकरी की तलाश से अमरता तक: साहिर लुधियानवी, जिनकी विद्रोही शायरी ने सिनेमा को समृद्ध किया, 8 मार्च जयंती विशेष

नौकरी के लिए भटकने से अमर गीतकार तक की यात्रा, संघर्षों के बाद सिनेमा जगत को मिले साहिर लुधियानवी


मुंबई, 7 मार्च। हिंदी सिनेमा जगत के कई सितारे ऐसे रहे, जो भले ही आज इस दुनिया में न हों, मगर उनकी रचनाएं हमेशा प्रशंसकों के बीच जिंदा रहेंगी। फैज और फिराक जैसे शायरों के दौर में उनकी तल्खी और विद्रोह अलग अंदाज में उभरे। वे आम जनता के शायर बने। जी हां, यहां बात हो रही है साहिर लुधियानवी की।

उनके गीतों ने हिंदी फिल्म संगीत को समृद्ध किया और झूठे रिवाजों के खिलाफ आवाज बुलंद की। 8 मार्च को उनकी जयंती है। उनकी शायरी और गीत आज भी दिलों में बसते हैं– कभी उदासी की गहराई, कभी विद्रोह की आग, कभी रोमांटिक उफान तो कभी सामाजिक सरोकार। साहिर ने फिल्मों को ऐसे गीत दिए जो साहित्य की ऊंचाई तक पहुंचे।

"तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा" जैसे गीत आज भी समाज को सोचने पर मजबूर करते हैं। साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हई था। वह 8 मार्च 1921 को लुधियाना (पंजाब) के एक जागीरदार परिवार में जन्मे थे। माता-पिता के बड़े लाडले थे, लेकिन बचपन में ही मां-पिता का अलगाव हो गया। मां ने घर छोड़ दिया, जिससे परिवार आर्थिक संकट में फंस गया।

साहिर मां के साथ रहे और गरीबी का सामना किया। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि साल 1943 के आसपास वह छोटी-मोटी नौकरियां तलाशते रहे– कभी उर्दू अखबारों में संपादक, कभी अन्य काम। नौकरी के लिए भटकने की नौबत आ गई थी, लेकिन उनके मन में उम्मीद की किरण बनी रही।

इसके बाद साल 1945 में उनकी पहली किताब 'तल्खियां' प्रकाशित हुई, जो उर्दू शायरी में चमक लाई। यह किताब जमाने को छू गई और साहिर उर्दू के चमकते सितारे बन गए। बस फिर क्या था, साल 1949 में वह मुंबई आए। शुरू में फिल्मों में अतिरिक्त संवाद लेखक का काम किया। उनके काम को देखते हुए साल 1951 में निर्देशक महेश कौल ने उन्हें पहला बड़ा मौका दिया। फिल्म 'नौजवान' में सचिन देव बर्मन के संगीत में साहिर के गीत आए। उसी साल गुरु दत्त की 'बाजी' ने उन्हें स्थापित किया। सचिन देव बर्मन के साथ उनकी जोड़ी कमाल की रही; फिल्म 'मुनीमजी' और 'प्यासा' जैसे क्लासिक्स में उनके गीत अमर हो गए।

साहिर के गीतों में प्रगतिशीलता और रोमांस का संतुलन था। उनके समय के फिल्ममेकर्स भी मानते थे कि साहिर महज गीतकार नहीं, संवेदनशील रचनाकार भी थे। फिल्म 'साधना' में "औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया" जैसे बोल महिलाओं के संघर्ष को बयां करते हैं। 'गुमराह' में "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों", 'शगुन' में "पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है", 'बहु बेगम' में "हम इंतजार करेंगे, तेरा कयामत तक" और 'चित्रलेखा' में "ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या" जैसे गीत भावनाओं और समाज की सच्चाई को उकेरते हैं।
 

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