AI से खुलेगा मैन्युफैक्चरिंग MSMEs के लिए खजाना, 2035 तक मिलेगा 150 अरब डॉलर का लाभ: रिपोर्ट

एआई से मैन्युफैक्चरिंग एमएसएमई को 2035 तक मिल सकता है 150 अरब डॉलर का फायदा: रिपोर्ट


नई दिल्ली, 7 मार्च। एआई भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए बड़ा बदलाव ला सकती है। अनुमान है कि 2035 तक एआई इस सेक्टर के मूल्य सृजन में 135.6 से 149.9 अरब डॉलर तक का योगदान दे सकती है। यह अनुमान उस स्थिति में लगाया गया है जब भारत के कुल मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडेड में एमएसएमई की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच जाए। शनिवार को जारी पीडब्ल्यूसी इंडिया और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) की संयुक्त रिपोर्ट में यह बात कही गई है।

पीडब्ल्यूसी इंडिया और ओआरएफ की इस रिपोर्ट के अनुसार, अगर भारत अपने जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत तक बढ़ाने में सफल होता है और एमएसएमई की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2023-24 के 35.4 प्रतिशत से बढ़कर 2047 तक 50 प्रतिशत हो जाती है, तो यह सेक्टर 3.13 से 3.21 ट्रिलियन डॉलर तक की विकास संभावनाएं खोल सकता है।

पीडब्ल्यूसी इंडिया के चेयरपर्सन संजय कृष्ण ने कहा कि अब एआई केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहा है। अगर इसे सहायक तकनीक के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो यह एमएसएमई को कम उत्पादकता के जाल से बाहर निकलने और गुणवत्ता, गति तथा नवाचार के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने में मदद कर सकता है।

उन्होंने कहा कि एआई को ऐसा बनाया जाना चाहिए जो सभी आकार के व्यवसायों के लिए सुलभ, किफायती और उपयोगी हो। इससे एमएसएमई अपनी संरचनात्मक सीमाओं को पार कर सकते हैं और वैश्विक मूल्य शृंखला में बेहतर तरीके से शामिल हो सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई मैन्युफैक्चरिंग एमएसएमई की पूरी वैल्यू चेन को बदल सकता है। इसमें मशीनों की पहले से मरम्मत की भविष्यवाणी, ऊर्जा अनुकूलन, कैमरा आधारित गुणवत्ता जांच, एआई आधारित लोन मूल्यांकन, बहुभाषी ग्राहक सेवा, नियमों का पालन और जनरेटिव डिजाइन जैसे कई उपयोग शामिल हैं।

एआई से तकनीकी क्षमता की बाधाएं कम होंगी और बड़े पैमाने पर उत्पादन की लागत भी घटेगी। इससे छोटे उद्योग बेहतर गुणवत्ता, वैश्विक मानकों और तेज उत्पादन हासिल कर सकेंगे।

रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर उद्योग में बड़े निवेश होने की संभावना है। इससे एमएसएमई को भी मौका मिलेगा क्योंकि वे कूलिंग उपकरण, हार्नेस और औद्योगिक पुर्जों जैसे गैर-तकनीकी पूंजीगत सामान की आपूर्ति कर सकते हैं।

इससे लंबे समय में 100 से 150 अरब डॉलर तक का नया मैन्युफैक्चरिंग अवसर पैदा हो सकता है।

वहीं, ओआरएफ के अध्यक्ष समीर सरन ने कहा कि भारत में एआई की सफलता केवल नई खोजों पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि यह तकनीक देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में कितनी व्यापक और समान रूप से फैलती है।

उन्होंने कहा कि एमएसएमई इस बदलाव के केंद्र में हैं और सही नीतियों, उद्योग और समाज के सहयोग से एआई को अपनाकर प्रतिस्पर्धा बढ़ाई जा सकती है, रोजगार सुरक्षित रखा जा सकता है और समावेशी विकास को आगे बढ़ाया जा सकता है।
 

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