वर्षा गायकवाड़ ने फडणवीस-शिंदे से की दो-टूक मांग: पुनर्वास तक रेलवे किनारे की झुग्गियों को न हटाया जाए

महाराष्ट्र : वर्षा गायकवाड़ की फडणवीस-शिंदे से मांग, रेलवे लाइन के पास की झुग्गीयों को पुनर्वास तक नहीं हटाया जाए


मुंबई, 18 फरवरी। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद वर्षा गायकवाड़ ने रेलवे लाइन के पास बसी झुग्गी-झोपड़ियों के निवासियों के पुनर्वास को लेकर बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और रेलवे प्रशासन को पत्र लिखकर मांग की है कि कुर्ला के बर्मा शेल (बर्मासेल) रेलवे लाइन के आसपास राजीव गांधी नगर, इंदिरा नगर, सुमन नगर और चिखलवाड़ी में रहने वाले गरीब परिवारों को तब तक न हटाया जाए, जब तक राज्य सरकार की पुनर्वास नीति अंतिम रूप से तय नहीं हो जाती और उनकी एलिजिबिलिटी की जांच पूरी नहीं हो जाती।

गायकवाड़ ने पत्र में कहा कि ये बस्तियां पिछले कई सालों से पुनर्वास के इंतजार में हैं। 2019 में बायोमेट्रिक सर्वे और 2022 में सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद अभी तक कोई पक्का फैसला नहीं हुआ है। इसके बजाय 2023 से लगातार बेदखली के नोटिस मिल रहे हैं, जिससे हजारों परिवारों में डर और अनिश्चितता का माहौल है। ये लोग दशकों से यहां रह रहे हैं और रेलवे सुरक्षा या विकास कार्यों के नाम पर उन्हें बिना वैकल्पिक व्यवस्था के हटाना अन्यायपूर्ण होगा।

उन्होंने मांग की कि रेलवे अधिकारियों, एमएमआरडीए (मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी), जिला कलेक्टर और संबंधित विभागों की संयुक्त बैठक बुलाई जाए। इसमें समयबद्ध पुनर्वास कार्यक्रम तय किया जाए ताकि किसी परिवार के साथ अन्याय न हो। गायकवाड़ ने जोर दिया कि पुनर्वास राज्य की स्लम रिहैबिलिटेशन पॉलिसी के अनुसार होना चाहिए, जिसमें एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया (कट-ऑफ डेट, दस्तावेज आदि) की जांच पूरी हो।

यह मुद्दा मुंबई में रेलवे ट्रैक के किनारे बसी बड़ी संख्या में झुग्गियों से जुड़ा है, जहां सुरक्षा कारणों से समय-समय पर हटाने की कार्रवाई होती है। हाल ही में कुर्ला-ट्रॉम्बे (बर्मा शेल) लाइन पर भी नोटिस जारी हुए थे, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में आंदोलन तेज हो गया। कांग्रेस नेता ने कहा कि बिना पुनर्वास के हटाना मानवीय संकट पैदा करेगा, क्योंकि ये परिवार गरीब मजदूर, दिहाड़ी मजदूर और छोटे व्यापारी हैं।

गायकवाड़ ने रेलवे और राज्य सरकार से अपील की कि वे मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं और प्रभावितों की सुनवाई करें। यदि जरूरी हो तो उच्चाधिकारियों की बैठक में सभी पक्षों को शामिल किया जाए।
 

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