टॉक्सिक कफ सिरप से बच्चों की जान से खिलवाड़: छिंदवाड़ा फार्मासिस्ट को हाईकोर्ट से नहीं मिली जमानत

मध्य प्रदेश: हाईकोर्ट ने छिंदवाड़ा कफ सिरप मामले में फार्मासिस्ट की जमानत याचिका खारिज की


भोपाल/जबलपुर, 17 फरवरी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार को टॉक्सिक कॉल्ड्रिफ कफ सिरप मामले में आरोपी फार्मासिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ प्रवीण सोनी, उनकी पत्नी ज्योति सोनी और भतीजे द्वारा दायर नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी।

अदालती आदेश के अनुसार, न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल की बेंच ने कहा कि पूरे मामले की गंभीरता और परिस्थितियों को देखते हुए यह जमानत देने योग्य मामला नहीं है। आरोप है कि फार्मासिस्ट ने डॉक्टर द्वारा निर्धारित नेक्स्ट्रो-डीएस की जगह कॉल्ड्रिफ सिरप वितरित किया। बिक्री का कोई बिल नहीं रखा गया और आरोपी ने 66 बोतलों सहित साक्ष्य नष्ट करने में भूमिका निभाई।

कोर्ट ने फार्मासिस्ट को दवाओं के सुरक्षित वितरण, रिकॉर्ड रखने और जनता की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार तकनीकी संरक्षक बताया। वहीं, प्रवीण सोनी ने कथित तौर पर बच्चों के लिए बिना प्रिस्क्रिप्शन कॉल्डरिफ सिरप दिया, जो गैरकानूनी और चिकित्सकीय रूप से अस्वीकार्य है। इस अनुचित प्रतिस्थापन और लाइसेंसिंग नियमों का उल्लंघन मिलकर इस त्रासदी का कारण बना।

कारखाने द्वारा निर्मित सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकोल की खतरनाक मात्रा पाई गई, जिसने बच्चों में तीव्र किडनी फेल्योर और 26 से अधिक बच्चों की मौत का कारण बनी। यह घटना अगस्त से अक्टूबर 2025 के बीच छिंदवाड़ा जिले के परासिया कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में हुई। मध्य प्रदेश सरकार ने 4 अक्टूबर 2025 को इस सिरप पर प्रतिबंध लगाया।

अभियोजन ने बताया कि फार्मासिस्ट और अन्य आरोपी, जिसमें डॉक्टर भी शामिल हैं, कथित रूप से कमीशन और मुनाफा प्राप्त कर रहे थे। गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य हानि और 26 से अधिक बच्चों की मौत को देखते हुए जमानत नामंजूर की गई। आरोपी 13 अक्टूबर 2025 से हिरासत में हैं।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ प्राथमिक साक्ष्य मजबूत हैं और ड्रग्स और कॉस्मेटिक्स अधिनियम की धारा 27(अ) सहित भारतीय न्याय संहिता की धारा 105, 276 और 238(बी) के तहत अपराध सिद्ध होता दिखाई देता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल जमानत से संबंधित है और इससे मामले की मुख्य सुनवाई प्रभावित नहीं होगी। यह निर्णय 2025 के कफ सिरप संकट की जांच के बीच आया है, जिसने दवा निर्माण, वितरण और प्रिस्क्रिप्शन में नियामक विफलताओं को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया है।
 
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