तानसेन के वंशज, 107 वर्ष के पद्म भूषण उस्ताद अब्दुल राशिद खान: जिन्होंने अंतिम सांस तक संगीत साधना की

उस्ताद अब्दुल राशिद खान : पद्म भूषण पाने वाले सबसे उम्रदराज संगीतकार, तानसेन के वंशज होने का गौरव


नई दिल्ली, 17 फरवरी। भारत के शास्त्रीय संगीत को उस समय गहरा झटका लगा, जब 18 फरवरी 2016 को 107 वर्ष की उम्र में उस्ताद अब्दुल राशिद खान ने इस दुनिया को अलविदा कर दिया। वे भारत के सबसे वरिष्ठ सक्रिय संगीतकार थे और पद्म भूषण से सम्मानित होने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति थे। खास बात यह है कि उन्हें तानसेन के वंशज होने का गौरव प्राप्त था।

उस्ताद अब्दुल राशिद खान का जन्म 19 अगस्त 1908 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली के निकट सलोन में एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनका वंश ग्वालियर घराने के प्रसिद्ध गायक बेहराम खान से जुड़ा हुआ था। उनके पिता छोटे यूसुफ खान और चाचा बड़े यूसुफ खान ने उन्हें संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दी।

परिवार की परंपरा में तानसेन के 16वीं पीढ़ी के वंशज होने का दावा किया जाता था, जिससे उनकी संगीत साधना में एक ऐतिहासिक गहराई जुड़ गई। उन्होंने खयाल, ध्रुपद, धमार और ठुमरी जैसी विभिन्न शैलियों में महारत हासिल की। उनकी आवाज में गमक, लयकारी और फिरत की वह विशेषता थी, जो ग्वालियर घराने की पहचान है।

उस्ताद साहब की जिंदगी संगीत और साधना की मिसाल थी। वे नियमित रूप से नमाज पढ़ते, कुरान की तिलावत करते और संगीत को इबादत मानते थे। 1973 से वे कोलकाता की आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी में रेजिडेंट गुरु के रूप में जुड़े और वहां 20 वर्षों से अधिक समय तक युवा कलाकारों को प्रशिक्षित किया। उनकी उम्र के बावजूद उनकी आवाज में वह ताकत और मिठास बरकरार रही, जो सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती थी। 100 वर्ष पार करने के बाद भी वे मंच पर प्रस्तुति देते रहे और संगीत सिखाते रहे।

2013 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, जो भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। उस समय वे 104-105 वर्ष के थे और यह सम्मान प्राप्त करने वाले सबसे बुजुर्ग व्यक्ति बने। इससे पहले उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड, काशी स्वर गंगा अवॉर्ड, रस सागर अवॉर्ड और अन्य कई सम्मान मिल चुके थे। उनकी जीवनी बताती है कि संगीत उनके जीवन का आधार था। वे कहते थे कि 'संगीत जीने के लिए है।'

उस्ताद अब्दुल राशिद खान ने न केवल ग्वालियर घराने की परंपरा को जीवित रखा, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक भी बने। उनके जाने से शास्त्रीय संगीत जगत में एक बड़ा शून्य पैदा हुआ। उनकी रचनाएं, बंदिशें और शिक्षण आज भी कई शिष्यों में जीवित हैं। वे एक ऐसे संगीतकार थे, जिन्होंने सौ वर्ष से अधिक समय तक संगीत को जिया और संगीत ने उन्हें अमर बना दिया।
 

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