भारत की सबसे बड़ी फुफकारने वाली छिपकली गोह: जहरीली नहीं, पर तस्करों के जाल में फंसी, क्या है इसका सच?

गोह, गोहटा या विषखोपड़ा... फुफकारती है यह विशाल छिपकली, इकोसिस्टम के लिए है वरदान


नई दिल्ली, 17 फरवरी। पृथ्वी पर उपस्थित जीव-जंतु इकोसिस्टम के लिए वरदान से कम नहीं होते। ऐसे ही एक जीव का नाम है गोह, जिसे गोहटा, विषखोपड़ा या मॉनिटर लिजर्ड भी कहा जाता है। गोह विशाल छिपकली सा दिखता है और अपनी लंबी जीभ से फुफकारता है, जो शिकार करने में मददगार है। यह संरक्षित प्रजाति तस्करी की वजह से संकट में है।

गोह को आम बोलचाल में गोईरा भी कहते हैं, भारत में पाई जाने वाली यह सबसे बड़ी छिपकली है। लोग आज भी इसे बेहद जहरीला और खतरनाक मानते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि भारत में मिलने वाली गोह की प्रजातियां खासकर बंगाल मॉनिटर लिजार्ड या वरानस बेंगालेंसिस में जहर नहीं पाया जाता।

विश्व में कुछ प्रजातियों जैसे कोमोडो ड्रैगन में हल्का विष पाया जाता है, जो इंसान को मार नहीं सकता, लेकिन भारतीय गोह में ऐसा कोई जहर नहीं होता। अगर गोह किसी को काट ले तो घाव गहरा हो सकता है और संक्रमण का खतरा रहता है। इसका कारण इसके मुंह में मौजूद बैक्टीरिया हैं, क्योंकि यह मांसाहारी है और कीड़े-मकोड़े, सांप, मेंढक, चूहे, मछली, छोटे पक्षी को खाता है।

गोह पूरी तरह मांसाहारी होता है। छोटे बच्चे कीड़े-मकोड़े खाते हैं, जबकि वयस्क गोह बड़े शिकार भी पकड़ लेते हैं। यह अपनी लंबी, दो फांक वाली जीभ को हवा में हिलाकर मुंह के जैकबसन ऑर्गन से उनका विश्लेषण कर शिकार का पता लगाता है। यह क्षमता इसे बेहद कुशल शिकारी बनाती है।

गोह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह कीड़ों की संख्या को नियंत्रित करता है, चूहों और सांपों को खाकर फसलों को नुकसान होने से बचाता है। इसलिए इसे खेतों, बागानों, तालाबों, जंगलों और यहां तक कि इंसानी बस्तियों के आसपास भी देखा जा सकता है। इनमें मादा गोह मिट्टी में गड्ढा खोदकर अंडे देती है।

दुधवा टाइगर रिजर्व जैसे क्षेत्रों में बंगाल मॉनिटर लिजार्ड की अच्छी मौजूदगी है। ये जीव आसानी से ढलने वाले और समझदार होते हैं। मानसून के मौसम में ये खास तौर पर सक्रिय दिखाई देते हैं। दुर्भाग्य से इस जीव की संख्या तेजी से घट रही है। भोजन की तलाश में गोह कभी-कभी घरों या बस्तियों में भी आ जाता है, लेकिन यह इंसान के लिए कोई खतरा नहीं है।

गोह को भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित किया गया है। इसकी हत्या, तस्करी या व्यापार करना गैर-कानूनी है और सजा का प्रावधान है। फिर भी अंधविश्वास और डर के कारण इसकी हत्याएं होती रहती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गोह को मारना इकोसिस्टम के लिए नुकसानदायक है। यह कीट-नियंत्रक के रूप में प्राकृतिक कीटनाशक का काम करता है।
 

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