भारतीय पैंगोलिन: प्रकृति का अनोखा प्रहरी जिसके अभेद्य कवच और लंबी जीभ के आगे शेर भी हो जाते हैं बेबस

प्रकृति का शांत प्रहरी : शरीर से लंबी जीभ, मजबूत खोल को तोड़ने में शेर भी होते हैं नाकाम


नई दिल्ली, 16 फरवरी। भारत के हरे-भरे जंगलों और पहाड़ी या मैदानी इलाकों में कई विचित्र पशु-पक्षी पाए जाते हैं। ऐसा ही विचित्र और शांत जीव भारतीय पैंगोलिन है। यह प्रकृति का शांत और अनोखा प्रहरी माना जाता है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानी, पहाड़ी, जंगली और शुष्क इलाकों में पाया जाता है।

इसे मोटी पूंछ वाला पैंगोलिन, पपड़ीदार चींटीखोर भी कहा जाता है। यह दुनिया का एकमात्र स्तनधारी जीव है, जिसके शरीर पर कठोर केरोटिन से बने ओवरलैपिंग शल्क (स्केल्स) होते हैं। ये शल्क 160-200 तक होते हैं, जो भूरे होते हैं और मिट्टी के रंग से मेल खाते हैं।

पैंगोलिन में कई खासियत हैं, जैसे खतरा महसूस होने पर पैंगोलिन खुद को गेंद की तरह सिकोड़ लेता है, जिससे शेर या बाघ जैसे शिकारी भी इसे आसानी से नहीं खोल पाते। इसका शरीर सिर से पूंछ तक 84-122 सेंटीमीटर लंबा होता है, पूंछ 33-47 सेंटीमीटर की और वजन 10 से 20 किलोग्राम तक होता है। यह एकांतप्रिय, शर्मीला, धीमा और निशाचर यानी रात में सक्रिय रहने वाला जीव है। यह दिन में अपने बिलों में छिपकर आराम करता है और रात्रि में भोजन की तलाश में निकलता है।

पैंगोलिन पेड़ों पर नहीं चढ़ता, लेकिन झाड़ियों, जड़ों और चींटी-दीमक टीलों वाले इलाकों को पसंद करता है। इसकी विशेषता है इसकी लंबी, चिपचिपी जीभ, जो शरीर से भी लंबी होती है। पूरी तरह बाहर निकालने पर यह जीभ 40 सेंटीमीटर या उससे ज्यादा लंबी हो सकती है। जीभ पेल्विस और अंतिम पसलियों के पास जुड़ी होती है, जिससे यह गहरी दरारों में चींटियों और दीमकों तक आसानी से पहुंच जाती है और चिपचिपी लार से कीड़े चिपक जाते हैं। पैंगोलिन मुख्य रूप से कीटभक्षी होते हैं।

यह चींटियों, दीमकों के अंडे, लार्वा और वयस्कों को खाता है। कभी-कभी भृंग या तिलचट्टे भी खाता है। अपने मजबूत आगे के लंबे पंजे से टीलों को फाड़ता है और जीभ से शिकार करता है। यह पारिस्थितिकी संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लाखों चींटियां और दीमक खाकर यह कीटों की संख्या नियंत्रित करता है, जिससे फसलों और जंगलों को नुकसान कम होता है। मिट्टी खोदकर हवा और पानी का संचार भी बेहतर करता है। लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय पैंगोलिन संकटग्रस्त श्रेणी में है। आईयूसीएन ने इसे रेड लिस्ट में रखा है। यह भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल है।

पैंगोलिन को सबसे बड़ा खतरा शिकार और शल्कों की अंतरराष्ट्रीय तस्करी का रहता है। पैंगोलिन के शल्कों को पारंपरिक दवाओं और आभूषणों में इस्तेमाल किया जाता है।

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट जैसी संस्थाएं मध्य प्रदेश वन विभाग के साथ मिलकर इसकी पारिस्थितिकी, उपस्थिति और निवास स्थान के उपयोग पर अध्ययन कर रहे हैं, ताकि बेहतर संरक्षण रणनीति बनाई जा सके।
 

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