जननायक कर्पूरी ठाकुर: बिहार के वो भारत रत्न मुख्यमंत्री, जो रिक्शा से चलते और फटी जेब का कुर्ता पहनते थे

कर्पूरी ठाकुर: बिहार के वो मुख्यमंत्री जो रिक्शा पर चलते थे, विरासत में देने के लिए गांव में मकान तक नहीं था


नई दिल्ली, 16 फरवरी। यह कहानी बिहार के एक ऐसे मुख्यमंत्री की है, जो एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार राज्य के मुखिया रहे, फिर भी चलना एक रिक्शे से ही होता था। पटना तो छोड़िए, अपने अंतिम सफर पर जाने से पहले तक उनके पैतृक गांव में उनका एक मकान तक नहीं था, जिसे वे विरासत में छोड़ जाते। ऐसी सादगी और ऐसी ईमानदारी का नाम जननायक और भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर था। अलग अंदाज में राजनीति करने वाले कर्पूरी ठाकुर की ईमानदारी और सादगी के ऐसे अनेकों किस्से हैं।

24 जनवरी 1924 को जन्मे कर्पूरी ठाकुर न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश के एक अनूठे नेता थे। कई मायनों में वे दुर्लभ गुणों वाले थे। स्कूल से निकलते ही वे समाजवादी धारा से जुड़े और आजीवन समाजवादी ही रहे। विचारों और सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया था। शब्द और कर्म में समानता बनाए रखी, जिसे डॉक्टर लोहिया 'कथनी और करनी में एकता' कहा करते थे। कर्पूरी ठाकुर हमेशा उसी राह के राही बने रहे। उनका आदर्श समाजवाद था।

कर्पूरी ठाकुर के लिए एक कवि ने लिखा था, "वो आदमी, जो भीड़ से घिरा बहुतों की नजर में सिरफिरा है, वो आदमी, जो भीड़ में घिरा है, दरअसल परमात्मा नहीं, भीड़ की आत्मा है।" ये शब्द भर नहीं, बल्कि कर्पूरी ठाकुर के व्यक्तित्व को बयां करती स्याही की जुबान है।

उनकी सादगी का एक किस्सा यह है कि जब उन्हें एक प्रतिनिधिमंडल में चुना गया था, जिसे ऑस्ट्रेलिया जाना था, तब कर्पूरी ठाकुर के पास कोई कोट नहीं था। उन्होंने दोस्त से कोट लिया, लेकिन वह भी फटा हुआ था। लेकिन बेझिझक होकर कर्पूरी ठाकुर वही कोट पहन ऑस्ट्रेलिया चले गए। कहा जाता है कि युगोस्लाविया के मार्शल टिटो की जब नजर कर्पूरी ठाकुर के कोट पर पड़ी थी, तो उन्होंने देखा कि वह फटा हुआ था। बाद में युगोस्लाविया के मार्शल टिटो ने कर्पूरी ठाकुर को एक नया कोट गिफ्ट किया।

कबीर की पंक्तियों के सहारे पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने कर्पूरी ठाकुर के जीवन पर लिखा, "दास कबीर जतन से ओढी, जस की तस धर दीन्हीं चदरिया।"

पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने एक बार लिखा, "वे राजनीति के सहारे नहीं चलते थे, बल्कि राजनीति उनके सहारे चलती थी। वे आजीवन स्वतंत्र नेता नहीं रहे, बल्कि किसी न किसी के अधीन काम करते रहे। जेपी, राम मनोहर लोहिया, राजनारायण और चौधरी चरण सिंह चौधरी जैसे नेताओं के अधीन रहकर काम करते रहे, लेकिन उनका स्वतंत्र ओज और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि अपने जीते जी जननायक कहलाने लगे।"

जेपी और राम मनोहर लोहिया उनके गुरु रहे। ये वह शख्सियतें थीं, जो मानती थीं कि गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति में भ्रष्टाचार खत्म कर देश को आगे ले जाना है। उसी राह पर कर्पूरी ठाकुर चले और यही ईमानदारी उनके जीवन का हिस्सा रही। इससे ज्यादा सादगी और क्या हो सकती है कि जिस तरह मुख्यमंत्री नहीं रहते हुए भी उनके पैतृक गांव में विरासत में देने लायक कोई मकान नहीं था, उसी जगह मुख्यमंत्री रहते उनके सिर्फ तन को ढकने वाले कपड़े हुआ करते थे। राज्य के मुखिया के कुर्ते की जेब तक फटी होती थी।

एक समय कर्पूरी ठाकुर के आवास पर बैठक थी, जिसमें चंद्रशेखर भी आए। उन्होंने देखा कि मुख्यमंत्री के कुर्ते की जेब फटी हुई है। चंद्रशेखर ने अपने कुर्ते को एक आंचल की तरह किया और मीटिंग में आए लोगों से चंदा लेने लगे। उन्होंने सभी से चंदा इकट्ठा किया और कर्पूरी ठाकुर को देने गए थे। उन्होंने सीएम से कहा था कि इन पैसों से एक नया कुर्ता सिला लीजिएगा। मगर सादगी से भरे कर्पूरी ठाकुर ने रुपयों को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन उनका उद्देश्य नया कुर्ता लेना नहीं था, बल्कि उन पैसों को मुख्यमंत्री राहत कोष में रखा। पत्रकार और लेखक अनुरंजन झा ने एक इंटरव्यू में बताया कि चंद्रशेखर ने उन्हें स्वयं ये किस्सा सुनाया था।

लोकतंत्र को अपना धर्म मानने वाले कर्पूरी ठाकुर जब-जब चुनाव मैदान में उतरे, तब-तब चुनाव का पहला चंदा लेने के लिए वे अपनी मां के पास गए। कभी एक आना तो कभी आठ आना, उन्होंने चुनाव में धन के दुरुपयोग की जगह उसके न्यूनतम उपयोग की सीमा को समझा और समझाया भी। उनके नेतृत्व कौशल का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 14 साल की उम्र में उन्होंने युवाओं को जोड़कर नवयुवक संघ की स्थापना की थी। एक लाइब्रेरी शुरू की और उसे संचालित भी किया। इस महान शख्सियत का निधन 17 फरवरी 1988 को हो गया।
 

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