महाशिवरात्रि पर आचार्य प्रशांत ने दी अद्भुत नाट्य प्रस्तुति, जहाँ ज्ञान-कला और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम हजारों ने देखा

महाशिवरात्रि पर आचार्य प्रशांत की विशेष नाट्य प्रस्तुति, ज्ञान-कला और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम प्रस्तुत


ग्रेटर नोएडा, 15 फरवरी। महाशिवरात्रि पर दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत हमारे लिए कुछ नया और गहरा लेकर आए। उन्होंने एक खास नाट्य प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में कला के प्रति उनका लगाव और ज्ञान के प्रति उनका समर्पण एक साथ दिखाई दिया।

उनका यह प्रदर्शन दिखाता था कि थिएटर लोगों को गहरी आध्यात्मिक बातों को समझाने में कितना असरदार हो सकता है। यह प्रस्तुति उनके विद्यार्थियों के लिए प्रेम-उपहार बनी। आचार्य कठिन से कठिन आध्यात्मिक बातों को आसान भाषा में समझाने के लिए जाने जाते हैं।

हजारों लोगों ने महाशिवरात्रि पर आचार्य प्रशांत को सुनने के लिए आवेदन किया था, लेकिन इसके लिए कुछ ही लोगों का चयन हुआ। लगभग 2,000 प्रतिभागियों का चयन उनकी सच्चाई और आत्म-शिक्षा के प्रति समर्पण के आधार पर किया गया था। इस भव्य आयोजन में एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।

प्रदर्शनी में पिछले छह महीनों के दौरान उनके 18 शहरों के दौरे की झलकियां दिखाई गईं। इसमें भारत के कुछ प्रमुख शिक्षण संस्थानों, खासकर 13 आईआईटी, प्रख्यात आईआईएम, और आईआईएस में हुए सत्र शामिल थे। इस दौरे के दौरान आचार्य ने 200 से अधिक सत्र किए। उन्होंने प्रेम और ईर्ष्या से लेकर एआई और वैश्विक घटनाओं तक, सैकड़ों प्रश्नों के उत्तर दिए।

आचार्य प्रशांत ने अपने नाटक को लेकर समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा, "यह ड्रामा न तो हमारे अंदर के झूठ को सामने लाने के लिए था और न ही सिर्फ हमें लाचार, कमजोर या रोता हुआ दिखाने के लिए। इसने एक गहरा सवाल पूछा कि क्या तुम सच में कमजोर हो, या तुमने अपनी तथाकथित कमजोरी में स्वार्थ पैदा कर लिया है? यह युवाओं के सामने एक चुनौती थी—क्या तुम सच में कमजोरी में जीना चाहते हो? खुद को लाचार घोषित करके तुम्हें क्या मिलेगा? कुछ सुविधाएं मिल जाती हैं, कुछ स्वार्थ पूरे हो जाते हैं। क्या इसकी कीमत यह है कि उसके लिए जीवन को दुर्बलता, दासता और बंधन में गुजार दो?"

आचार्य प्रशांत कहते हैं, "श्रीमद्भगवद्गीता कोई आम प्रवचन नहीं है, यह जिंदगी के युद्ध के मैदान में बोली गई धर्म की आवाज है। ऐसा नहीं है कि कोई शांत आश्रम, हिमालय की कोई चोटी, नदी का किनारा या किसी पेड़ की छांव हो, जहां सीखने के लिए उत्सुक शिष्य आते हैं और कोई गुरु उन्हें सिखाता है। नहीं, यह युद्ध है। यह अपने ही खून के खिलाफ युद्ध है, इच्छा के खिलाफ युद्ध है।"

उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र में जो कुछ भी हुआ, वह आज भी जारी है, इसलिए आज का युवा गीता के संदर्भ और उसके उपदेशों में अपने लिए बड़ी समकालीन उपयोगिता देखता है। ऐसा लगता है जैसे वह बात अर्जुन से नहीं, बल्कि आज के युवाओं से कही जा रही हो। जैसे वह बात हजारों साल पुरानी न होकर आज के संदर्भ में हमसे कही गई हो, जैसे अर्जुन हम ही हों। जब युवा यह देखते हैं कि यह बात दूर की नहीं, बल्कि हमसे ही कही गई है, तो वे उससे जुड़ाव महसूस करते हैं।

आचार्य प्रशांत ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता आज की समस्याओं को संबोधित करती है। ऐसे में युवाओं की श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति स्वाभाविक रुचि होती है। हमारा जो गीता समागम कार्यक्रम है, उससे हजारों लोग जुड़ चुके हैं, क्योंकि सभी के भीतर यही पुकार होती है कि झूठ और बंधन में नहीं जीना है।
 
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