हरदीप पुरी का वो खूंखार मिशन: जब मौत के मुंह से निकलकर भारत-श्रीलंका रिश्तों को दी नई दिशा

जैसे मौत से सामना था, हरदीप सिंह पुरी का वह गुप्त मिशन, जिसने भारत-श्रीलंका रिश्तों को नई दिशा दी


नई दिल्ली, 14 फरवरी। 1980 के दशक में जो व्यक्ति एक राष्ट्राध्यक्ष और एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या और श्रीलंका के एक और राष्ट्रपति की हत्या के प्रयासों का जिम्मेदार ठहराया जा चुका था, उस व्यक्ति से जंगल में मुलाकात करना मौत से मुलाकात करने जैसा था, क्योंकि उनके कारनामों से ही साफ था कि वह निहायत ही खतरनाक व्यक्ति था। सिर्फ मुलाकात करना नहीं, बल्कि दो मुल्कों के बीच एक अहम समझौते को उसी मुलाकात के जरिए उसके अंजाम तक पहुंचाना था। यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी उस समय के भारतीय विदेश सेवा में वरिष्ठ अधिकारी रहे हरदीप सिंह पुरी को, जिन्होंने अपनी हिम्मत से वह कर दिखाया, जिससे श्रीलंका और भारत के रिश्तों को एक नई मजबूती मिली थी।

15 फरवरी 1952 को दिल्ली (भारत) के दरियागंज में जन्मे हरदीप सिंह पुरी श्रीलंका में भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी के तौर पर तैनात थे। उस दौर में श्रीलंका में एथनिक क्राइसिस (गृह युद्ध) जारी था। जाफना में प्रभाकरण से मिलने की जिम्मेदारी हरदीप सिंह पुरी को सौंपी गई थी। वे प्रभाकरण से बिना किसी डर के मिलने पहुंच गए। जिंदगी का खतरा उठाते हुए जंगलों से गुजर प्रभाकरण से मिलना था, क्योंकि भारत और श्रीलंका की सरकार के बीच एक पीस एग्रीमेंट (भारत-श्रीलंका समझौता 1987) होना था।

प्रभाकरण को इस समझौते की जानकारी देनी थी। बिना किसी डर हरदीप सिंह पुरी जाफना के लिए निकल लिए। जंगल लैंड माइंस से भरा पड़ा था। उस समय हमलों जैसी स्थितियां बनी हुई थीं और वे जैसे-तैसे जाफना के अंदर पहुंच चुके थे और फिर मुलाकात का वक्त तय हुआ। उस समय नेवल अफसर बीके गुप्ता भी हरदीप सिंह पुरी के साथ थे।

पहले प्रभाकरण से लोगों से हरदीप सिंह पुरी का सामना हुआ। उन्होंने उन लोगों के जरिए दिल्ली का मैसेज प्रभाकरण तक पहुंचाया। मुलाकात जरूर हो रही थी, लेकिन किसी को एक दूसरे पर भरोसा नहीं था। इसलिए प्रभाकरण के लोगों ने हरदीप सिंह पुरी और उनकी टीम को शुरुआत में प्रभाकरण के पास ले जाने से मना कर दिया था।

फिर अंधेरे में उन्हें प्रभाकरण से मुलाकात के लिए ले जाया गया। हालांकि, उन्हें रास्ते में इतना घुमा दिया था कि वे लोकेशन और रास्तों को याद नहीं कर सकते थे। हरदीप सिंह पुरी हिम्मत के साथ इस मिशन पर चलते रहे। आखिर में जब प्रभाकरण से मुलाकात हुई तो हरदीप सिंह पुरी ने उसे दिल्ली के लिए आमंत्रित किया। एक एलटीटीई सदस्य ने उनसे कहा कि 'आप हमारे राष्ट्रीय खजाने को ले जा रहे हैं।'

इस पर पुरी ने उन्हें वचन दिया कि जिस जगह से प्रभाकरण को ले जा रहे हैं, उसी जगह छोड़कर जाएंगे, भले बातचीत का परिणाम कुछ भी हो। वे उन्हें नई दिल्ली के साथ वार्ता करने के लिए राजी करने में सफल रहे। यह जुलाई 1987 में भारत-श्रीलंका समझौते पर हस्ताक्षर के बाद हुआ। हरदीप सिंह पुरी ने एक इंटरव्यू में जाफना के इस गुप्त मिशन के बारे में बताया था।

हरदीप सिंह पुरी ने अपने जीवन के उद्देश्य को बहुत कम उम्र में ही पहचान लिया था और उन्होंने देश की जनता की सेवा करने का निश्चय कर लिया था। उन्होंने यह भलीभांति समझा कि कानून और राजनीति आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और शासन के लिए आवश्यक साधन हैं, इसलिए उन्होंने कानून की पढ़ाई की ताकि राजनीति में आने के बाद वे अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभा सकें। कॉलेज के दिनों में वे हिंदू कॉलेज में एबीवीपी के सदस्य के रूप में छात्र राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल रहे।

2014 में वे औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और सितंबर 2017 में उन्हें आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया। मई 2019 में उन्हें नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। 2020 में वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए और जुलाई 2021 में उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस एवं आवास एवं शहरी मामलों के केंद्रीय मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया।
 

Similar threads

Latest Replies

Trending Content

Forum statistics

Threads
6,983
Messages
7,015
Members
18
Latest member
neodermatologist
Back
Top