'सर्फ' की ललिता जी से 'उड़ान' की कविता चौधरी तक: समझदारी और शक्ति सिखाने वाली अदाकारा को भावभीनी श्रद्धांजलि

यादों में कविता : 'सर्फ की खरीदारी में ही समझदारी है...' वो ललिता जी, जिन्होंने आसमान में 'उड़ान' भरना भी सिखाया


मुंबई, 14 फरवरी। 1980 के दशक में भारतीय टेलीविजन पर एक विज्ञापन आता था। साधारण सी साड़ी में एक महिला, सब्जी वाले से मोलभाव करते हुए बड़ी बेबाकी से कहती थी, "भाई साहब, सस्ती चीज और अच्छी चीज में फर्क होता है।" वह आवाज किसी फिल्मी स्टार की नहीं थी, बल्कि हर भारतीय घर की उस समझदार गृहिणी की थी, जो पाई-पाई का हिसाब रखना जानती थी। वह 'ललिता जी' यानी कविता चौधरी थीं। एक ऐसा नाम, जिन्होंने भारतीय टेलीविजन को सिर्फ एंटरटेनमेंट बॉक्स नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का हथियार बनाया।

कविता चौधरी की कहानी की शुरुआत किसी फिल्मी सेट से नहीं, बल्कि दिल्ली के मंडी हाउस स्थित 'राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय' (एनएसडी) के गंभीर माहौल से होती है। साल था 1978 के आसपास का। वह एक ऐसे क्लासरूम का हिस्सा थीं, जिसमें अनुपम खेर, सतीश कौशिक, और गोविंद नामदेव जैसे भविष्य के दिग्गज उनके साथ बेंच साझा करते थे।

उनके सहपाठी और दोस्त सतीश कौशिक अक्सर उनकी प्रतिभा का लोहा मानते थे। यह उनकी दोस्ती और कविता की प्रतिभा का ही कमाल था कि आगे चलकर जब कविता ने अपना खुद का शो 'उड़ान' बनाया, तो उन्होंने अपने उसी दोस्त सतीश कौशिक को निर्देशित किया। एक महिला निर्देशक का उस दौर में कमान संभालना अपने आप में एक क्रांति थी।

कविता चौधरी का सबसे बड़ा योगदान निस्संदेह टीवी धारावाहिक 'उड़ान' (1989-1991) था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कल्याणी सिंह का वह किरदार कोरी कल्पना नहीं थी। वह किरदार कविता की अपनी सगी बहन, कंचन चौधरी भट्टाचार्य की असली जिंदगी से प्रेरित था। कंचन चौधरी, किरण बेदी के बाद देश की दूसरी महिला आईपीएस अधिकारी बनी थीं।

'उड़ान' की कहानी उस दौर के भारत के लिए एक तमाचा भी थी और मरहम भी। धारावाहिक में जब कल्याणी के पिता (विक्रम गोखले द्वारा निभाया गया एक यादगार किरदार) अपनी जमीन खो देते हैं और सिस्टम से हारने लगते हैं, तो कल्याणी फैसला करती है कि वह सिस्टम का हिस्सा बनकर उसे बदलेगी।

शो का वह दृश्य आज भी रोंगटे खड़े कर देता है, जब कल्याणी को महसूस कराया जाता है कि परिवार में बेटा न होने से 'कुल का दीपक' नहीं है। तब उनके पिता का यह विश्वास दिलाना कि उनकी बेटियां किसी बेटे से कम नहीं हैं, ने भारत में 'जेंडर डिस्कोर्स' (लैंगिक विमर्श) को बदल कर रख दिया था। 'उड़ान' देखने के बाद सिविल सेवा परीक्षाओं में बैठने वाली लड़कियों की संख्या में भारी उछाल आया था। कविता चौधरी ने अपनी कलम और निर्देशन से यह साबित कर दिया कि एक औरत को 'अबला' दिखाने के बजाय अगर 'सबल' दिखाया जाए, तो टीआरपी तब भी मिल सकती है।

अगर 'उड़ान' ने उन्हें सम्मान दिलाया, तो 'ललिता जी' ने उन्हें घर-घर में अमर कर दिया। 1980 के दशक के अंत में बाजार में 'निरमा' का सस्ता पाउडर राज कर रहा था। 'सर्फ' महंगा था और उसे अपनी जगह बनानी थी। तब विज्ञापन गुरु एलिक पदमसी और उनकी टीम ने कविता चौधरी को चुना।

कविता ने ललिता जी के किरदार में जान फूंक दी। वह कोई ग्लैमरस मॉडल नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी महिला थीं जो तर्क करती थीं। उनका वह मशहूर संवाद, "सर्फ की खरीदारी में ही समझदारी है," महज एक टैगलाइन नहीं, बल्कि भारतीय मध्यम वर्ग का जीवन दर्शन बन गया।

उन्होंने सिखाया कि कभी-कभी थोड़ा ज्यादा खर्च करना फिजूलखर्ची नहीं, बल्कि एक सही 'निवेश' होता है। यह शायद भारतीय विज्ञापन इतिहास का पहला ऐसा कैंपेन था, जिसने गृहिणी को एक 'इंटेलिजेंट डिसीजन मेकर' (बुद्धिमान निर्णयकर्ता) के रूप में पेश किया।

सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी कविता चौधरी ने कभी गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। 'योर ऑनर' (2000) और 'आईपीएस डायरीज' (2015) जैसे शोज के जरिए उन्होंने हमेशा यथार्थवाद का दामन थामे रखा।

उनके जीवन का अंतिम अध्याय खामोशी और संघर्ष का रहा। वह कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रही थीं, लेकिन अपनी तकलीफ को उन्होंने कभी तमाशा नहीं बनने दिया। उनकी दोस्त सुचित्रा वर्मा ने कई पब्लिक इंटरव्यू में बताया कि अस्पताल के बिस्तर पर भी कविता की आंखों में वही चमक और गरिमा थी, जो कल्याणी सिंह की आंखों में हुआ करती थी।

15 फरवरी 2024 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
 
Similar content Most view View more

Latest Replies

Forum statistics

Threads
16,711
Messages
16,748
Members
20
Latest member
7519202689
Back
Top