रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का चौंकाने वाला कबूलनामा: अफगानिस्तान में पाकिस्तान की नीति हुई फेल, 'हम थे भाड़े की फौज'

ख्वाजा आसिफ की स्वीकारोक्ति अफगानिस्तान में पाकिस्तानी नीति की विफलता की सीधी पुष्टि


काबुल, 13 फरवरी। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में दिए अपने एक बयान में कहा है कि उनका देश अफगानिस्तान में 'भाड़े की फौज' की तरह काम कर रहा था। यह पाकिस्तान की नीति में हुई बड़ी विफलता को सीधे तौर पर स्वीकार करने जैसा है। उनके बयान पाकिस्तान की अफगान नीति पर देश के भीतर चल रही समीक्षा को उजागर करते हैं और यह संकेत देते हैं कि इस्लामाबाद अपनी सुरक्षा संकट की जिम्मेदारी काबुल पर थोपने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान की असेंबली में इस्लामाबाद आत्मघाती हमले के बाद दिए गए अपने हालिया बयान में, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने आतंकवाद की निंदा की और अफगानिस्तान में पाकिस्तान की दशकों लंबी भूमिका को 'भाड़े की फौज' के रूप में बताया।

अफगान डायस्पोरा नेटवर्क ने टोलो न्यूज का हवाला देते हुए रिपोर्ट किया कि उनके इस बयान के साथ ही पाकिस्तान के गृह मंत्रालय द्वारा नए आरोप और सोशल मीडिया पर साझा विश्लेषण यह दिखाते हैं कि पाकिस्तान अपने अतीत के हस्तक्षेपों और वर्तमान सुरक्षा संकट के बीच सामंजस्य स्थापित करने में संघर्ष कर रहा है।

आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान अफगान संघर्ष में 22 से 23 साल तक पश्चिमी हितों की सेवा के लिए शामिल रहा, धार्मिक कारणों से नहीं। उन्होंने तर्क दिया कि अफगान संघर्षों में शामिल होने का निर्णय अमेरिका का समर्थन पाने के उद्देश्य से लिया गया था, किसी वैचारिक विश्वास के कारण नहीं।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अपनी गलती अभी तक पूरी तरह से स्वीकार नहीं की है और अब वही दोहराई जा रही है।

आसिफ की स्वीकृति उस दावे को चुनौती देती है कि पाकिस्तान वर्षों तक अफगानिस्तान में अपनी भागीदारी को धार्मिक कर्तव्य और मुस्लिम दुनिया की रक्षा के रूप में पेश करता रहा।

पूर्व अफगान राजदूत अजीज मारेक ने कहा कि आसिफ के बयान ज्यादा जिम्मेदारी स्वीकारने के बारे में नहीं हैं, बल्कि पाक अधिकारियों को जिम्मेदारी से मुक्त करने के प्रयास हैं।

उन्होंने बताया कि पाकिस्तान की अफगानिस्तान में गतिविधियां आर्थिक लाभ के लिए प्रेरित थीं।

आसिफ के बयान में पाकिस्तान की तालिबान के प्रति नाराजगी भी झलकती है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान, जो पहले पाकिस्तान की चिंताओं को सुनता था, अब 'हिचकिचाहट' दिखा रहा है और आतंकवाद विरोधी आश्वासन देने में अनिच्छुक है। उनके बयान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बिगड़ते संबंधों को भी उजागर करते हैं। पहले पाकिस्तान तालिबान के सत्ता में लौटने से अपनी पश्चिमी सीमा को सुरक्षित करने की उम्मीद करता था।

अफगान डायस्पोरा नेटवर्क की रिपोर्ट में, जर्मनी के हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान छात्र काजिम जाफरी ने कहा कि ख्वाजा आसिफ का यह कबूलनामा कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में 'भाड़े की फौज' की तरह कार्य करता रहा, पाकिस्तान के किसी मंत्री द्वारा नीति विफलता को स्वीकार करने का सबसे सीधा उदाहरण है। साथ ही, उनका भाषण पाकिस्तान की अफगान नीति के भीतर मौजूद विरोधाभासों को भी उजागर करता है। अतीत की गलतियों को स्वीकार करने की इच्छा, लेकिन दोष दूसरों पर डालने पर निर्भरता बनी हुई।

उन्होंने आगे कहा, "अफगानिस्तान के लिए ये बयान स्पष्ट और चिंताजनक दोनों हैं। ये पाकिस्तान की अफगान नीति पर उसके आंतरिक आत्ममूल्यांकन को उजागर करते हैं, लेकिन साथ ही पाकिस्तान के सुरक्षा संकट की जिम्मेदारी काबुल पर डालने के नए प्रयास का संकेत भी देते हैं।''
 

Forum statistics

Threads
13,931
Messages
13,968
Members
20
Latest member
7519202689
Back
Top