सुषमा स्वराज: बैर की राजनीति में भी दिल जीतने वाली, जिनकी वाणी में जनता और दिल में बसता था स्वराज

सुषमा स्वराज: बैर की राजनीति में मुरीद बना लेने का कमाल, जिनकी जुबान पर होते थे जनता के जज्बात


नई दिल्ली, 13 फरवरी। "तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लूटा? हमें रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का ख्याल है।" यह अद्भुत वक्ता, कुशल राजनीतिज्ञ, पूर्व विदेश मंत्री और 'पद्म विभूषण' सुषमा स्वराज की राजनीति का अंदाज था। एक ऐसी नेता, जिन्होंने भाजपा की राजनीति भले ही की, लेकिन वह जहां भी और जब भी बोलने के लिए खड़ी हुईं, लगा कि हिंदुस्तान बोल रहा है। वह हिंदुस्तान को सोचती थीं, हिंदुस्तान को ही जीती थीं और हिंदुस्तान को ही ओढ़ती-बिछाती थीं। असल में वह राजनीति की सुषमा थीं और स्वराज उनके दिल में बसता था।

14 फरवरी 1952 को हरियाणा के अंबाला कैंट में जन्मी सुषमा स्वराज के राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1970 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से हुई, और उस समय पिता हरदेव शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हुआ करते थे। जुलाई 1975 में सुप्रीम कोर्ट के ही सहकर्मी स्वराज कौशल से उनकी शादी हो गई।

उनके पति स्वराज कौशल, सोशलिस्ट लीडर जॉर्ज फर्नांडिस के साथ करीबी तौर पर जुड़े थे और सुषमा स्वराज 1975 में जॉर्ज फर्नांडिस की लीगल डिफेंस टीम का हिस्सा बनीं। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के 'सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन' में सक्रिय तौर पर हिस्सा लिया। इमरजेंसी के बाद वह जनता पार्टी की सदस्य बनीं।

1977 में पहली बार सुषमा ने हरियाणा विधानसभा का चुनाव जीता। उन्होंने महज 25 साल की उम्र में चौधरी देवी लाल सरकार में राज्य की श्रम मंत्री बनकर सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बनने की उपलब्धि अपने नाम की। 80 के दशक में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ और यहां से सुषमा के राजनीतिक जीवन की एक नई यात्रा शुरू हुई।

वे जानती थीं कि जनता से कैसे जुड़ा जाता है और उनके दिलों में कैसे खुद के लिए घर बनाया जाता है। बहुत कम नेता होते हैं, जो कुर्सियों से कमाल नहीं रचते, बल्कि अपनी सूझबूझ से कुर्सियों की महत्वता निर्धारित करते हैं। कुछ उसी तरह सुषमा स्वराज ने सत्ता या विपक्ष को नहीं, बल्कि अपनी नैतिक ईमानदारी से सियासत को साधा।

90 का दशक उनके लिए कई अवसर लेकर आया था, जिसने खासतौर पर उन्हें एक राज्य से पूरे देश की नेता बना दिया। 1990 में पहली बार राज्यसभा सदस्य के रूप में उन्होंने संसद का रास्ता तय किया और फिर 1996 में दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीतकर अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिनों की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बनाई गईं।

साल 1998 काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा, जब उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि, उनका यह कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चला और 1998 के आखिरी महीने में इस्तीफा दे दिया। अगले साल 1999 में लोकसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने उन्हें कर्नाटक के बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार दिया। हालांकि, उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन बाद में उत्तर प्रदेश के राज्यसभा सदस्य के रूप में वे संसद वापस लौटीं। उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्री के तौर पर केंद्रीय कैबिनेट में शामिल किया गया, यह पद उन्होंने सितंबर 2000 से जनवरी 2003 तक संभाला।

भाजपा में उनका कद बढ़ता गया। वह जनवरी 2003 से मई 2004 तक स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और संसदीय मामलों की मंत्री थीं। उन्होंने 15वीं लोकसभा के लिए 2009 का चुनाव मध्य प्रदेश के विदिशा से जीता। सुषमा स्वराज 21 दिसंबर 2009 को लाल कृष्ण आडवाणी की जगह 15वीं लोकसभा में विपक्ष की लीडर बनीं और मई 2014 तक इस पद पर रहीं।

"हम बहुत दिनों से यह बात कह रहे हैं कि प्रभावी लोकपाल बिल होना चाहिए। सशक्त और स्वतंत्र लोकपाल बिल होना चाहिए, लेकिन उसका स्वराज क्या होगा? कौन से बिल को हम प्रभावी कहेंगे और कौन से बिल को हम सशक्त कहेंगे? देश पूछेगा और यह देश जानना चाहता है।"

भ्रष्टाचार के खिलाफ जब भी अन्ना हजारे का अनशन याद आता है, उस समय मनमोहन सिंह की सरकार हिल उठी थी। संसद के संयुक्त सत्र में सुषमा स्वराज ने विपक्ष की नेता के तौर पर जो कहा था, उससे हर किसी का दिल जीत लिया था।

2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो विदेश मंत्री के तौर पर उन्हें एक ऐसे चेहरे की तलाश थी, जो भाजपा में अच्छी अंग्रेजी भी जानता हो और भारत की बात को दुनिया के हर मंच पर दमदार तरीके से रख सके। यह खोज सुषमा स्वराज पर आकर खत्म हुई। जिम्मेदारियां संभालने के लिए वे दुनिया के नक्शे पर भारत की आवाज दमदार तरीके से रखने लगीं।

बात 2015 की है, जब भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तल्खी बहुत अधिक बढ़ चुकी थी। एक अक्टूबर को विदेश मंत्री की हैसियत से संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने पाकिस्तान को बेनकाब करके रख दिया था। पूरी दुनिया के सामने उन्होंने दमदार संदेश पहुंचाने की कोशिश की कि पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्ट्री है।

2017 में जब वे संयुक्त राष्ट्र में पहुंचीं तो उनके भाषण ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बंटोरीं। 23 सितंबर को उन्होंने कहा, "भारत ने स्कॉलर पैदा किए, वैज्ञानिक, इंजीनियर और डॉक्टर पैदा किए। पाकिस्तान ने सिर्फ दहशतगर्द और जिहादी पैदा किए। सब जानते हैं कि डॉक्टर मरते हुए लोगों की जिंदगी बचाते हैं और जिहादी जिंदा लोगों को मार डालते हैं।"

सिर्फ विरोधी मुल्कों पर ही नहीं, सियासी विरोधियों पर भी सुषमा स्वराज का प्रहार जबरदस्त होता था। वे अपनी दमदार दलीलों से विरोधियों को चारों खाने चित कर देती थीं। जब लोकसभा में वे नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाल रही थीं, तब सत्ता में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी। एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे थे और तब उन्होंने मनमोहन सिंह पर शेरो-शायरी करते हुए कटाक्ष किए।

वे भारतीय राजनीति की एक ऐसी हस्ती थीं, जिनके जैसी लकीर कोई नहीं खींच पाया। वे अपने चार दशकों की सियासत में अमिट छाप छोड़ गईं। 6 अगस्त 2019 को सुषमा स्वराज का निधन हुआ।
 
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