जमानत याचिकाओं पर अत्यधिक देरी पर दिल्ली हाईकोर्ट की फटकार, कहा- मौलिक अधिकारों का हनन, मानसिक पीड़ा

दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाओं पर निर्णय में देरी पर व्यक्त की गंभीर चिंता


नई दिल्ली, 13 फरवरी। दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाओं के निपटारे में हो रही अत्यधिक देरी पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि ऐसी अर्जियों को लंबे समय तक लंबित रखना जेल में बंद आरोपी के लिए मानसिक पीड़ा जैसा है और यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2021 के एक हत्या मामले में आरोपी की जमानत याचिका में अत्यधिक देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि लंबित जमानत याचिकाएं जेल में बंद आरोपी के लिए मानसिक कष्ट पैदा करती हैं और उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं।

सिंगल-जज बेंच के न्यायमूर्ति गिरिश कथपलिया ने अपने आदेश में लिखा कि आरोपी अमीर की जमानत याचिका ट्रायल कोर्ट में 25 महीने तक लंबित रही और दिल्ली हाईकोर्ट में भी लंबित रही। मैं रिकॉर्ड पर रखना चाहता हूं कि आरोपी के वकील ने पूरी ईमानदारी और शिष्टता से जताई कि 25 महीने तक ट्रायल कोर्ट में जमानत याचिका लंबित रही, भले ही उन्होंने शीघ्र सुनवाई के लिए आवेदन किया था और यहां भी इस याचिका का निपटारा नहीं हुआ। यह याचिका अब तक लंबित है।

आरोपी अमीर की जमानत सीमापुरी पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 302, 307 और 34 के अंतर्गत दर्ज एफआईआर के मामले से संबंधित थी। अभियोजन के अनुसार, घटना वाले दिन शिकायतकर्ता अनीस और उनके मित्र सुबहान, सोहैल, अर्शद और समीर साथ बैठे थे, जब तीन अन्य आरोपी वहां पहुंचे और झगड़ा शुरू हो गया।

अभियोजन के अनुसार, एक सह-आरोपी ने शोएब को चाकू मार दिया, जिसकी बाद में मृत्यु हो गई, और सोहैल पर भी हमला किया जब उसने बीच-बचाव किया। आरोपी अमीर पर सोहैल को पीछे से पकड़ने का आरोप था।

आरोपी के वकील ने कहा कि अमीर 24 अक्टूबर 2021 से हिरासत में है और यह घटना अचानक हुई थी। उन्होंने यह भी बताया कि घायल गवाह सोहैल, जिसे आरोपी ने पकड़ा था। वह बच गया और पहले ही ट्रायल कोर्ट में गवाही दे चुका है।

अभियोजन ने जमानत याचिका का विरोध किया और कहा कि आरोप गंभीर हैं। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि सभी सार्वजनिक गवाहों की गवाही पहले ही हो चुकी है और जमानत मिलने पर आरोपी साक्ष्यों में छेड़छाड़ नहीं कर सकता।

दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाओं में देरी को अस्वीकार्य बताते हुए कहा, “यह गंभीर चिंता का विषय है कि जमानत याचिकाएं सत्र अदालत और इस अदालत दोनों में इतनी लंबे समय तक लंबित रहीं।”

न्यायमूर्ति कथपलिया ने कहा, “अनेकों न्यायिक निर्णयों में बार-बार कहा गया है कि जमानत याचिका लंबित न रहे। लंबे समय तक लंबित रहना ही जेल में बंद आरोपी के लिए मानसिक कष्ट और उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।”

लंबी हिरासत और ट्रायल की स्थिति को देखते हुए अदालत ने कहा कि आरोपी को और स्वतंत्रता से वंचित करने का कोई कारण नहीं है।

न्यायमूर्ति कथपलिया ने आदेश दिया कि आरोपी को 10,000 रुपए की व्यक्तिगत जमानत और इसी राशि की एक जमानतदार के साथ ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि पर रिहा किया जाए।

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की एक प्रति संबंधित जेल अधीक्षक को तुरंत भेजी जाए ताकि आरोपी को सूचित किया जा सके।
 

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