महाशिवरात्रि पर चित्तौड़गढ़ का अद्भुत नजारा: यहां कुंड में डूबे बाबा भोलेनाथ, प्रकृति करती है जलाभिषेक

महाशिवरात्रि स्पेशल: यहां पानी के कुंड में डूबे हैं बाबा भोलेनाथ, प्राकृतिक जलधारा करती है जलाभिषेक


नई दिल्ली, 13 फरवरी। 'गोमुख भरे निर्भयानाथ की ठोर, करोड़ों वर्ष तपस्या करे, जब पावे गढ़ चितौड़,' ये कहावत चितौड़गढ़ दुर्ग के लिए बिल्कुल सटीक बैठती है। यहां कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जो किसी को भी हैरान कर सकते हैं।

चितौड़गढ़ के किले के पास ऐसा ही शिव मंदिर है, जो प्रकृति और आस्था दोनों का केंद्र है। माना जाता है कि यहां दर्शन करने वाले भक्त को सारे जन्मों के पाप से मुक्ति मिल जाती है।

चित्तौड़गढ़ किले के पूर्वी प्रवेश द्वार के पास स्थित गोमुख कुंड महादेव एक अद्भुत जलाशय है, जो जटिल नक्काशी और प्राचीन मूर्तियों से सुशोभित है। गोमुख कुंड में गाय के मुंह के आकार के कई कुंड बने हुए हैं जो शिवलिंग पर 12 महीने जलाभिषेक करते हैं। हालांकि पहाड़ों की ऊंचाईयों पर बाबा का जलाभिषेक करने वाली जलधारा कहां से निकलती है, इसके बारे में कोई नहीं जानता है, लेकिन कुछ लोग इसे पवित्र नदी बेराच का उद्गम स्थल मानते हैं, जिससे मंदिर की आस्था और बढ़ जाती है।

खास बात ये है कि गोमुख कुंड में पानी के नीचे शिवलिंग स्थापित है। कुंड में घुटनों तक पानी हमेशा भरा रहता है और साफ और पवित्र पानी छोटी-छोटी मछलियों का घर है। दर्शन करने आए भक्तों को कुंड में छोटी-छोटी मछलियां भी देखने को मिलती हैं।

माना जाता है कि कुंड में विराजमान शिवलिंग स्वयंभू और ऊर्जा का केंद्र भी है। गोमुख कुंड ध्यान और आध्यात्मिक चिंतन के लिए आदर्श स्थल है क्योंकि यहां की ऊर्जा और शांत वातावरण सारी नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करने की शक्ति रखते हैं।

गोमुख कुंड जितना शांत और ऊर्जा से भरा है, वहीं कुंड की दीवारें इतिहास को खुद में समेटे हुए हैं। कुंड की दीवारों पर राजपुताना शिल्प कौशल देखने को मिलता है, जहां दीवारों में गाय और हिंदू देवी-देवताओं की कुछ प्रतिमाओं को बारीकी से उकेरा गया है। कुंड का बनाव चट्टान के नीचे की तरफ है, और ये बना कैसे है, ये भी आज तक रहस्य ही है।

वैसे तो प्रतिदिन गोमुख कुंड में भगवान शिव की पूजा की जाती है, लेकिन सावन और महाशिवरात्रि के मौके पर गोमुख कुंड में भक्तों की विशेष भीड़ देखने को मिलती है। महाशिवरात्रि पर भक्त कुंड के पास भक्ति से सराबोर गीत गाते हैं और भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह का उत्सव भी मनाते हैं।
 

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