कैलाश खेर से पहले इस सिंगर ने गाया था 'बम लहरी' भक्ति गीत, शब्दों में पिरोकर बयां की थी शिव महिमा

कैलाश खेर से पहले इस सिंगर ने गाया था 'बम लहरी' भक्ति गीत, शब्दों में पिरोकर बयां की थी शिव महिमा


नई दिल्ली, 13 फरवरी। 15 फरवरी को देशभर में महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाने वाला है और त्योहार को भव्य बनाने के लिए हर संभव कोशिशें की जा रही हैं।

महाशिवरात्रि आस्था और प्रेम का त्योहार है जिसे बॉलीवुड में कई बार अपने शब्दों और धुनों के साथ पिरोकर बनाने की कोशिश की गई है। इसी कड़ी में सबसे पॉपुलर गाना कैलाश खेर का "अगड़ बम शिव लहरी" है, जिसमें भगवान शिव के गुण और मां पार्वती के साथ उनके रिश्ते को अच्छे से दिखाया गया है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये गाना, पुराने गाने से प्रेरित गीत है और इसका ऑरिजन भक्ति गीत 12 मिनट से ज्यादा लंबा है?

12 मिनट से लंबे ऑरिजन भक्ति गीत "अगड़ बम शिव लहरी" के गायक हरियाणा और उत्तर प्रदेश के लोक गायक बंसी जोगी थे, जिन्हें शिव भक्ति में लीन कई गीत गाते हुए देखा गया। उन्होंने साल 1990 के समय कभी शिव भक्ति से सराबोर गीत दिए, जिनमें बम लहरी, 'अगड़ बम बम लहरी', 'मैं भांग रगड़ के पिया करूं', और 'सिरसागर से चल्या जा' जैसे गाने सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहे। उन्होंने अपनी खुद की म्यूजिक कंपनी बंसी जोगी एंड पार्टी भी खोली थी जिससे साफ पता चलता है कि कैलाश खेर द्वारा गाया गया बम 'अगड़ बम बम लहरी' 1995 में बंसी जोगी ने गाया था, हालांकि गाने के लिरिक्स में थोड़ा बदलाव है।

इस पूरे गाने में गायक बंसी ने लोकल म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट के जरिए ही संगीत तैयार किया और गीत में भगवान शिव और मां पार्वती के रिश्ते, शादी और रस्मों को शब्दों में पिरोकर दर्शकों का दिल जीता है। गीत का हर शब्द एक कहानी की तरह है। अगर आप गीत को दोबारा ध्यान से सुनेंगे तो पाएंगे कि पहले भगवान शिव मां पार्वती को उनसे शादी न करने के लिए मना रहे हैं और बता रहे हैं कि वे अघोरी होकर कैसा जीवन जीते हैं, लेकिन मां पार्वती के प्रेम और जिद्द के आगे हार मान जाते हैं।

भक्ति गीत के एक और दूसरे वर्जन में तीन मुट्ठी राख का भी जिक्र किया गया है, जिसमें लालच कैसे सिर पर सवार हो जाता है। गीत में मां पार्वती और भगवान शिव की शादी होने के बाद ब्राह्मणों को दान देने की रस्म को दर्शाया गया है, जिसमें बाबा कहते हैं कि मेरे पास देने के लिए सिर्फ राख है और वे ब्राह्मणों को राख दान करते हैं, जिसमें एक मुट्ठी राख वैभव, दूसरी मुट्ठी राख ज्ञान और तीसरी मुट्ठी राख सुख और शांति का प्रतीक है, लेकिन लालची ब्राह्मण राख को पानी में बहा जाते हैं और नदी सोने-चांदी के सिक्कों से भर जाती है। अब ब्राह्मण नदी से सोने की मोहरों को निकालने की कोशिश करता है, लेकिन हाथ आती है सिर्फ राख।

कैलाश खेर ने अपने गाने में सिर्फ कुछ अंश का इस्तेमाल किया है, पूरा गाना नहीं लिया है, लेकिन आज के समय में ओरिजिनल भक्ति गीत की बजाय उनके नए वर्जन को ज्यादा पसंद किया जा रहा है।
 

Latest Replies

Forum statistics

Threads
16,118
Messages
16,155
Members
20
Latest member
7519202689
Back
Top