अखलाक मुहम्मद खान 'शहरयार' पुण्यतिथि: पिता का ख्वाब पुलिस वर्दी, उन्होंने चुनी लफ्जों की दुनिया, बने उर्दू के सरताज

अखलाक मुहम्मद खान पुण्यतिथि विशेष: पुलिस अफसर बनाना चाहते थे पिता, लेकिन बन गए 'शहरयार'


मुंबई, 12 फरवरी। उर्दू शायरी के बड़े नाम अखलाक मुहम्मद खान उर्फ शहरयार की जिंदगी का सफर काफी दिलचस्प रहा है। जिस दौर में सरकारी नौकरी को सबसे सुरक्षित और सम्मानजनक माना जाता था, उस दौर में शहरयार ने अपने लिए एक अलग रास्ता चुना। उनके पिता चाहते थे कि बेटा पुलिस अफसर बने, लेकिन शहरयार का मन पुलिस की वर्दी से ज्यादा लफ्जों पर आकर्षित होता था।

उन्होंने परिवार की इच्छा से अलग जाकर साहित्य और शायरी की राह पकड़ी। उनका ये छोटा-सा फैसला आगे चलकर उर्दू शायरी के इतिहास का बड़ा नाम बना।

अखलाक मुहम्मद खान का जन्म 16 जून 1936 को उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के आंवला कस्बे में हुआ था। उनके पिता, अबू मुहम्मद खान, पुलिस विभाग में अधिकारी थे। घर का माहौल अनुशासन और नियमों से जुड़ा था। उनके पिता चाहते थे कि बेटा भी पुलिस सेवा में जाए। बचपन में शहरयार ने खेलों में भी रुचि दिखाई और कुछ समय तक एथलीट बनने का सपना भी देखा, लेकिन धीरे-धीरे किताबों और शायरी ने उनका मन अपनी ओर खींचा। उनके अंदर शब्दों की दुनिया बसने लगी।

उन्होंने अपनी पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से की। यहां उन्होंने उर्दू साहित्य को बारीकी से समझा। 1961 में उन्होंने उर्दू में एमए की डिग्री हासिल की। इसी दौरान उनकी मुलाकात शायर खलील-उर-रहमान आजमी से हुई, जिन्होंने उनकी शायरी को नई दिशा दी। शुरू में उनकी रचनाएं अपने असली नाम अखलाक मुहम्मद खान से छपीं, लेकिन बाद में उन्होंने 'शहरयार' उपनाम अपनाया। यही नाम आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

1960 के दशक में उनकी शायरी ने धीरे-धीरे साहित्य जगत में जगह बनानी शुरू कर दी। उनकी कविताओं और गजलों में आम आदमी की जिंदगी, अकेलापन, प्रेम आदि की सोच दिखाई देती थी। वह सीधे और सरल शब्दों में अपनी बात कहते थे। यही वजह रही कि उनकी शायरी पढ़ने और सुनने वाले हर उम्र के लोग उनसे जुड़ गए।

1966 में शहरयार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में लेक्चरर बने। बाद में वे प्रोफेसर और फिर विभागाध्यक्ष भी रहे। शिक्षक के रूप में वे बेहद लोकप्रिय थे। पढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने शायरी लिखना भी जारी रखा। उनकी किताब 'ख्वाब का दर बंद है' को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, जिसने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई।

शहरयार को हिंदी सिनेमा में भी खास पहचान मिली, खासकर फिल्म 'उमराव जान' के गीतों से, लेकिन उन्होंने फिल्मी दुनिया में ज्यादा काम नहीं किया।

उर्दू साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और बाद में ज्ञानपीठ सम्मान से नवाजा गया। वे उर्दू के उन चुनिंदा रचनाकारों में शामिल हैं, जिन्हें यह सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान मिला। 13 फरवरी 2012 को अलीगढ़ में उनका निधन हो गया।
 

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