सुभाष घई का प्रशंसकों को संदेश: 'वंदे मातरम' सिर्फ गाएं नहीं, राष्ट्रगीत की आत्मा को गहराई से महसूस करें

सुभाष घई की प्रशंसकों से अपील, 'वंदे मातरम' के अर्थ को गहराई से समझें और फिर गाएं


मुंबई, 12 फरवरी। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे हो गए हैं। इस मौके पर मशहूर फिल्म निर्देशक-निर्माता सुभाष घई ने खास अंदाज में राष्ट्रगीत के प्रति अपने विचार व्यक्त किए।

उन्होंने इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर कर लिखा, "वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का जश्न।" सुभाष ने इस पोस्ट से फैंस से अपील की कि वंदे मातरम को सिर्फ गाना नहीं, बल्कि इसके गहरे अर्थ को भी समझकर गाया जाना चाहिए।

सुभाष ने कहा, "वंदे मातरम हमारा राष्ट्रीय देशभक्ति गीत है। यह हमारे देश की आत्मा और संस्कृति को दर्शाता है। इस गीत में हम अपनी मातृभूमि भारत के प्रति गर्व, सम्मान और प्रेम व्यक्त करते हैं। हमें इस गीत का अर्थ हिंदी और अंग्रेजी में समझना चाहिए ताकि हम जो छहों अंतरे गाते हैं, उन्हें सही भावना और समझ के साथ महसूस कर सकें। जय भारत।"

राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1870 के दशक में लिखा था, जो उनकी किताब 'आनंदमठ' में शामिल हुआ। इसके पहले दो छंद संस्कृत में देवी दुर्गा की शक्ति और मातृभूमि की महिमा का वर्णन करते हैं, जबकि बाकी पंक्तियों में मातृभूमि की सुंदरता और भावनाओं को व्यक्त किया गया है। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतबद्ध किया और 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र में पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया। इसके बाद यह गीत स्वतंत्रता संग्राम और स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बन गया।

14 अगस्त 1947 को संविधान सभा की पहली बैठक की शुरुआत इस गीत से हुई, और 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया।

सुभाष घई की बात करें तो उन्होंने अपने काम के साथ-साथ अपने संस्थान, व्हिसलिंग वुड्स इंटरनेशनल, पर ध्यान केंद्रित किया। अपने स्कूल के माध्यम से उन्होंने कई प्रतिभाओं को निखारा है। कुछ समय पहले ही उनके स्कूल के बच्चों ने 'रॉकेटशिप' नाम की एक शॉर्ट फिल्म बनाई है। फिल्म का ट्रेलर रिलीज कर दिया गया, लेकिन अभी तक इसकी रिलीज की कोई घोषणा नहीं हुई।
 

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