अज्ञान और पाखंड मिटाने वाले निडर दयानंद: 'वेदों की ओर लौटो' जिन्होंने गांधी से पहले दिया 'स्वराज' का मंत्र

निडर दयानंद : 'वेदों की ओर लौटो...' जिसने गांधीजी से पहले दिया था 'स्वराज' का मंत्र


नई दिल्ली, 11 फरवरी। 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में जन्मे मूलशंकर (स्वामी दयानंद सरस्वती) बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। कहा जाता है कि दो वर्ष की आयु में ही उन्होंने गायत्री मंत्र का शुद्ध उच्चारण करना सीख लिया था।

जब माता-पिता ने उन्हें सांसारिक मोह में बांधने के लिए विवाह की तैयारी की, तब 22 साल की उम्र में उन्होंने घर की दीवारों को लांघ दिया। अगले 15 साल वे एक 'परिव्राजक' बनकर नंगे पैर हिमालय की कंदराओं से लेकर नर्मदा के तटों तक भटकते रहे। इसी दौरान नर्मदा तट पर स्वामी पूर्णानंद सरस्वती ने उन्हें 'दयानंद सरस्वती' का नाम दिया। लेकिन, उनकी शिक्षा तब पूरी हुई जब वे मथुरा के 'अंध-ऋषि' स्वामी विरजानंद के पास पहुंचे।

गुरु विरजानंद ने दक्षिणा में कोई धन नहीं मांगा, बल्कि ऐसा वचन मांगा, जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी। उन्होंने कहा, "दयानंद, जाओ और समाज से अज्ञानता और पाखंड को मिटाकर वेदों का प्रकाश फैलाओ।"

1875 में बंबई में 'आर्य समाज' की स्थापना करना केवल एक धार्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह भारतीय मानस को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करने का एक अभियान था। स्वामी जी ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया। उनका मानना था कि भारतीय समाज की कमजोरी का कारण वेदों के वास्तविक ज्ञान का विस्मरण और अंधविश्वासों का बोलबाला है।

उनकी कालजयी कृति 'सत्यार्थ प्रकाश' ने समाज के हर वर्ग को झकझोर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि ईश्वर निराकार और सर्वव्यापक है। उन्होंने केवल हिंदू धर्म की कुरीतियों पर ही प्रहार नहीं किया, बल्कि अन्य मतों की मान्यताओं को भी तर्क की कसौटी पर परखा।

स्वामी दयानंद सरस्वती एक ऐसे समाज सुधारक थे जिन्होंने समस्या की जड़ पर प्रहार किया। उन्होंने उस दौर में महिलाओं और दलितों के अधिकारों की बात की, जब यह कल्पना करना भी कठिन था।

उन्होंने जन्म आधारित जाति व्यवस्था को सिरे से नकारा। उन्होंने कहा कि मनुष्य महान अपने कर्मों से होता है, जन्म से नहीं। स्वामी दयानंद सरस्वती ने दलितों को जनेऊ धारण करने और वेद पढ़ने का अधिकार देकर सदियों पुरानी बेड़ियों को तोड़ा।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने घोषणा की कि स्त्रियां ऋषिका बन सकती हैं। बाल विवाह के खिलाफ आंदोलन छेड़ा और विधवा विवाह का समर्थन किया। आज जो हम 'डीएवी' स्कूलों और कन्या पाठशालाओं का जाल देखते हैं, वह उन्हीं के विजन का परिणाम है।

अक्सर इतिहास में स्वामी जी को केवल एक धार्मिक सुधारक के रूप में देखा जाता है, लेकिन वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 'स्वराज' शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने निर्भीकता से कहा, "विदेशी राज्य चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह स्वदेशी राज्य (स्वराज) की बराबरी नहीं कर सकता।"

स्वामी जी के विचारों ने जहां लाखों अनुयायी बनाए, वहीं उनके शत्रुओं की भी कमी नहीं थी। उन्हें 17 बार विष देने के प्रयास हुए। 1883 में जोधपुर में, जब उन्होंने महाराज जसवंत सिंह को एक नर्तकी के प्रभाव से दूर रहने की सलाह दी, तो षड्यंत्रकारियों ने उनके दूध में पिसा हुआ कांच और विष मिला दिया।

30 अक्टूबर 1883 को दीपावली की शाम, जब पूरा देश दीयों की रोशनी में नहाया था, भारत का यह तेजस्वी सूर्य अस्त हो गया। जोधपुर में रसोइए द्वारा दूध में कांच का चूर्ण मिलाकर जहर दिए जाने के कारण, वे काफी समय तक बीमार रहे और अंततः उनका निधन हुआ।
 
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