चेन्नई, 11 फरवरी। तमिलनाडु सरकार ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें कहा जा रहा था कि कक्षा 10 की सार्वजनिक परीक्षा (एसएसएलसी) में छात्रों को तमिल भाषा के पेपर से छूट दे दी गई है।
सरकारी अधिकारियों ने इन खबरों को “पूरी तरह झूठा” बताते हुए लोगों से अपील की कि वे अपुष्ट संदेशों पर भरोसा न करें। पिछले एक सप्ताह से व्हाट्सऐप और एक्स पर यह दावा किया जा रहा था कि राज्य सरकार ने एसएसएलसी परीक्षा में तमिल को अनिवार्य विषय नहीं रखने का निर्णय लिया है।
वायरल संदेशों में यह भी कहा गया कि भाषाई अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों को तमिल के बजाय अपनी मातृभाषा में परीक्षा देने की अनुमति दी जाएगी। इन दावों के तेजी से फैलने से छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच भ्रम और चिंता की स्थिति पैदा हो गई।
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। नाम तमिलर काची (एनटीके) के मुख्य समन्वयक सीमन सहित कुछ नेताओं ने इसे पाठ्यक्रम में तमिल की स्थिति को कमजोर करने की कोशिश बताते हुए आलोचना की।
हालांकि, तमिलनाडु सरकार की आधिकारिक तथ्य-जांच एजेंसी ‘टीएन फैक्ट चेक’ ने हस्तक्षेप करते हुए इन दावों को निराधार बताया। एजेंसी ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई नीति-निर्णय नहीं लिया गया है और कक्षा 10 की सार्वजनिक परीक्षा में तमिल अब भी अनिवार्य विषय है।
सरकार ने यह भी बताया कि भ्रम कैसे पैदा हुआ। वर्ष 2020 से 2023 के बीच, मद्रास हाईकोर्ट के निर्देशों के आधार पर मान्यता प्राप्त कुछ भाषाई अल्पसंख्यक स्कूलों के छात्रों को तमिल पेपर से अस्थायी छूट दी गई थी। यह छूट केवल उन्हीं स्कूलों को दी गई थी, जिन्होंने औपचारिक रूप से राहत की मांग की थी।
इन अनुरोधों के आधार पर यह रियायत केवल 2023-24 शैक्षणिक सत्र तक सीमित थी और यह स्थायी नियम नहीं था। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2025 में किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी गई है।
सरकार ने दोहराया कि वर्तमान नियमों के तहत तमिल विषय अनिवार्य है और भ्रामक जानकारी फैलाने से छात्रों में अनावश्यक घबराहट पैदा हो सकती है। अभिभावकों और छात्रों को सलाह दी गई है कि वे परीक्षा से जुड़ी जानकारी के लिए केवल स्कूल शिक्षा विभाग की आधिकारिक घोषणाओं पर ही भरोसा करें।