मिलन अभ्यास से अफ्रीकी देशों संग गहरे होंगे भारत के रिश्ते, चीन की कर्ज कूटनीति पर लगेगी लगाम

आईएफआर के जरिए अफ्रीकी देशों के लिए खुलेंगे नए आयाम, चीन के बढ़ते प्रभाव पर भी लगेगी लगाम


नई दिल्ली, 10 फरवरी। चीन दुनिया भर के देशों को अपनी कर्ज नीति में फंसा रहा है। अफ्रीकी देशों पर भी वह पिछले एक दशक से ज्यादा समय से अपना फोकस बढ़ाए हुए है, जो भारत के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है।

भारत के लिए अफ्रीकी देश सामरिक और व्यापारिक तौर पर महत्वपूर्ण हैं और भारत सरकार अलग-अलग तरीकों से अपने पुराने रिश्तों को और मजबूत करना शुरू कर चुकी है। इस मजबूती की एक झलक विशाखापत्तनम में 15 फरवरी से 25 फरवरी तक आयोजित होने वाले इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और ‘मिलन’ अभ्यास में भी देखने को मिलेगी।

इस कार्यक्रम में 70 से ज़्यादा देश शामिल हो रहे हैं, जिनमें 20 से अधिक अफ्रीकी देश हैं। ये देश सिर्फ अफ्रीका के ईस्ट कोस्ट से ही नहीं, बल्कि वेस्ट कोस्ट से भी हैं। नौसेना के मुताबिक, सेशेल्स और साउथ अफ्रीका अपने जंगी जहाजों के साथ शामिल होंगे, जबकि बाकी देश अपने नौसैनिक अधिकारियों के साथ भाग लेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिशन सागर से महासागर का मंत्र दिया है और नौसेना इसे बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ा रही है। इसमें अफ्रीकी देशों की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि आत्मनिर्भर भारत के तहत देश में बनाए जा रहे स्वदेशी उपकरणों के लिए इन्हें एक बड़े बाजार के तौर पर देखा जा रहा है। भारतीय डिफेंस इंडस्ट्री भी तेजी से आगे बढ़ रही है।

इसके अलावा, अफ्रीकी देशों में मौजूद खनिज संसाधनों और हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में भारत उनकी मदद कर सकता है और अपनी ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा कर सकता है। भारत अफ्रीकी देशों के साथ रक्षा सहयोग को मजबूत करने में जुटा है, जिसमें सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग और मेंटेनेंस भी शामिल हैं।

इसी कड़ी में पिछले साल अप्रैल में नौसेना ने पहली बार दो बड़े अभियानों को अंजाम दिया था। पहला था आईओआर यानी इंडियन ओशन शिप सागर और दूसरा समुद्री सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए भारतीय नौसेना और तंज़ानिया पीपुल्स डिफेंस फोर्स द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एआईकेईवाईएमई अभ्यास।

छह दिन के इस अभ्यास में अफ्रीकी देश कोमोरोस, जिबूती, इरीट्रिया, केन्या, मेडागास्कर, मॉरीशस, मोज़ाम्बिक, सेशेल्स और दक्षिण अफ्रीका शामिल हुए थे। इस अभ्यास का मकसद समुद्री सुरक्षा के अलग-अलग पहलुओं पर ट्रेनिंग देना और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना था।

अगस्त 2021 में भारतीय नौसेना ने अल्जीरियाई नौसेना के साथ अपना पहला पीएएसएसईएक्स अभ्यास अल्जीरियाई तट पर किया था। दिसंबर 2024 में रूस से भारत के लिए रवाना हुआ आईएनएस तुशील मोरक्को के कैसाब्लांका बंदरगाह पर भी रुका था।

भारत में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफ्रीकी संघ को जी20 के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने का समर्थन किया। यह एक ऐसा कदम था जिसने अफ्रीकी देशों के प्रति भारत के नजरिए को साफ तौर पर पेश किया।

रिश्तों को और मजबूती देने के लिए कई हाई-प्रोफाइल दौरे भी हुए। अक्टूबर 2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु स्टेट विजिट पर अल्जीरिया गई थीं। इसके अलावा, सीडीएस जनरल अनिल चौहान के अल्जीरिया दौरे के दौरान अल्जीरियाई पीपुल्स नेशनल आर्मी के साथ रक्षा सहयोग पर समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।

साल 2023 में वॉयस ऑफ़ द ग्लोबल साउथ प्रक्रिया का आयोजन किया गया था। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अपना पहला विदेश दौरा अफ्रीकी देश अल्जीरिया का किया।

इन मज़बूत होते सामरिक रिश्तों के पीछे एक और बड़ी वजह अफ्रीकी देशों पर चीनी प्रभाव को कम करना भी है। चीन लगातार दुनिया भर के छोटे और गरीब देशों में अपना प्रभाव तेजी से बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में चीन ने साल 2017 में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अफ्रीकी देश जिबूती में अपना पहला ओवरसीज़ मिलिट्री बेस स्थापित किया था। जिबूती रेड सी और अदन की खाड़ी के किनारे स्थित है। इसके अलावा चीन अफ्रीकी देशों को कम कीमत पर और सस्ते लोन के जरिए सैन्य साजो-सामान भी मुहैया कराता है। इसका खुलासा SIPRI की एक रिपोर्ट में भी हुआ था।
 

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