नई दिल्ली, 10 फरवरी। राज्यसभा में मंगलवार को अल्पसंख्यकों की पहचान प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और नीतिगत मुद्दे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। सदन में आंध्र प्रदेश से भाजपा सांसद पाका वेंकट सत्यनारायण इस विषय पर अपनी बात रखी।
उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता के बाद जिन समुदायों को अल्पसंख्यक के रूप में चिह्नित किया गया था, सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आज उनकी संख्या न केवल बनी हुई है, बल्कि उसमें बढ़ोतरी भी हुई है। उनके अनुसार, यह स्थिति देश की चुनावी सुधार प्रक्रिया और विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज को भी प्रभावित कर सकती है।
भाजपा सांसद ने कहा कि मूल रूप से कुछ अत्यंत पिछड़े वर्ग, जैसे विमुक्त, अर्ध-घुमंतू और घुमंतू जनजातियां, संख्या में बहुत कम हैं और आर्थिक रूप से भी बेहद कमजोर हैं। ये वे वर्ग हैं जिनकी आजीविका के साधन सीमित हैं और जिनके पास दैनिक जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएं भी पूरी करने के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। इसके बावजूद, इन्हें व्यापक पिछड़े वर्गों की श्रेणी में रख दिया गया है, जिससे उनकी वास्तविक समस्याएं और जरूरतें अक्सर अनदेखी रह जाती हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि संविधान और विभिन्न शोध व सांख्यिकीय मानकों के अनुसार अल्पसंख्यक की पहचान केवल धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि संख्या, भाषा, भौगोलिक निवास, सामाजिक स्थिति और जीवन-शैली जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। उनके अनुसार, वास्तव में ये अत्यंत पिछड़े और संख्यात्मक रूप से कम समुदाय ही वास्तविक अल्पसंख्यक हैं, जिन्हें आज भी हाशिए पर रखा गया है।
पाका वेंकट सत्यनारायण ने सरकार से आग्रह किया कि वह अल्पसंख्यक की मूल अवधारणा पर दोबारा विचार करे। यह स्पष्ट करें कि अल्पसंख्यक किसे कहा जाए, इसकी परिभाषा क्या होनी चाहिए और किन-किन समुदायों को इस श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए। इस पूरे विषय की गहन समीक्षा संबंधित मंत्रालय द्वारा की जानी चाहिए ताकि वे वर्ग जो ऐतिहासिक रूप से व्यवस्था के कारण पीछे रह गए हैं, उन्हें वास्तविक रूप से सशक्त बनाया जा सके।
उन्होंने अपने वक्तव्य में डॉ. भीमराव अंबेडकर की मंशा का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय का असली उद्देश्य यह है कि जो समुदाय लंबे समय से हाशिए पर हैं, उन्हें समान दर्जा मिले और वे समाज की मुख्यधारा में आ सकें। यदि अल्पसंख्यक की पहचान और वर्गीकरण सही ढंग से किया जाता है, तो इससे सामाजिक न्याय की भावना को मजबूती मिलेगी और वास्तविक रूप से वंचित वर्गों का उत्थान संभव हो सकेगा।
भाजपा सांसद ने सभापति के माध्यम से सरकार से अपील की कि वह इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें और आवश्यक कदम उठाए, ताकि सामाजिक संतुलन कायम हो सके और संविधान की मूल भावना के अनुरूप सभी वर्गों को न्याय मिल सके।