बांग्लादेश में चुनाव से पहले अल्पसंख्यकों का गहराता डर: बढ़ती कट्टरता और राजनीतिक हालात बने असुरक्षा का कारण

चुनाव से पहले बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों में गहरी असुरक्षा की भावना: रिपोर्ट


ढाका, 9 फरवरी। 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनावों की तैयारी के बीच बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना और गहराती जा रही है। एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि मौजूदा राजनीतिक हालात और बढ़ती कट्टरता के कारण देश में अल्पसंख्यक खुद को पहले से कहीं अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

मिशन नेटवर्क न्यूज में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, फॉरगॉटन मिशनरीज इंटरनेशनल (एफएमआई) के ब्रूस एलन ने कहा कि बांग्लादेश का सामाजिक माहौल अनिश्चितता से भरा हुआ है। उन्होंने बताया कि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली मौजूदा कार्यवाहक सरकार के दौरान देश में बढ़ती उग्रता के प्रति उदासीनता देखी जा रही है, जिसके चलते उत्पीड़न, गुस्सा और महंगाई बढ़ी है।

एलन के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है, “हालात पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गए हैं।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां एक ओर लोग चुनाव का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश की मौजूदा स्थिति को लेकर व्यापक असंतोष भी है। रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में जेनरेशन-जेड का राजनीतिक आंदोलन भी बिखरता नजर आ रहा है। पिछले साल दिसंबर में छात्र-नेतृत्व वाली नेशनल सिटिजन पार्टी ने जमात-ए-इस्लामी के साथ बहुदलीय गठबंधन बनाया, जिसका अतीत विवादों से भरा रहा है।

ब्रूस एलन ने कहा कि बांग्लादेश में ईसाई, हिंदू और बौद्ध जैसे अल्पसंख्यक समुदाय इस असुरक्षा को और अधिक गहराई से महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट में उनके हवाले से कहा गया, “कट्टरपंथी मुसलमान मौजूदा अराजकता से और अधिक सक्रिय हो रहे हैं। ऐसे में चर्च स्थापित करने वालों और उनकी मंडलियों को गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है।”

रिपोर्ट में एक पादरी ‘मिंटू’ का भी जिक्र किया गया है, जिनकी चर्च निर्माण की योजना को मुस्लिम पड़ोसियों के विरोध के कारण रोक दिया गया। बताया गया कि पिछले डेढ़ साल से चर्च निर्माण का काम पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है।

एलन के अनुसार, बांग्लादेश में कई ईसाई ऐसे भूखंडों पर रहते हैं, जिनका स्वामित्व उनके पास नहीं है, बल्कि वह जमीन सरकार या मुस्लिम पड़ोसियों की होती है, जिससे उन्हें कभी भी बेदखली का खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम बहुसंख्यक समाज के पास सारी शक्ति होने के कारण ईसाई समुदाय का उनके साथ संबंध बेहद संवेदनशील है।
 

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