भारतीय वायुसेना का 'तेजस Mk1A' केवल एक लड़ाकू विमान नहीं, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता की उड़ान का प्रतीक है। 83 विमानों का ऑर्डर पहले ही दिया जा चुका है और 97 और विमानों की मंजूरी के साथ (कुल संख्या 180 से अधिक हो सकती है), यह विमान आने वाले दशकों तक भारतीय वायुसेना (IAF) की रीढ़ बना रहेगा।
लेकिन इस गौरवमयी कहानी में एक बड़ी रणनीतिक खामी (Strategic Gap) छिपी है। इस विमान का 'दिल' यानी इसका इंजन – GE F404-IN20 – आज भी पूरी तरह से अमेरिका से आयात किया जा रहा है। इसका भारत में न तो कोई लाइसेंस निर्माण हो रहा है और न ही कोई महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT)।
यह स्थिति और भी हैरान करने वाली लगती है जब हम इसकी तुलना भविष्य के 'तेजस Mk2' और 'AMCA' प्रोजेक्ट्स से करते हैं, जिनके लिए अधिक शक्तिशाली GE F414 इंजन चुना गया है और उसे भारत में ही बनाने (Co-production) और 80% तकनीक हासिल करने की तैयारी चल रही है।
सवाल यह है कि जिस इंजन (F404) पर हमारी वायुसेना अगले 30 साल तक निर्भर रहेगी, उसे हमने 'मेड इन इंडिया' क्यों नहीं बनाया?
तेजस का 'विदेशी दिल': F404 की कहानी
GE F404-IN20 एक विशेष रूप से तैयार किया गया इंजन है, जो लगभग 84-85 kN का थ्रस्ट (ताकत) पैदा करता है। इसे भारत की गर्म जलवायु और लद्दाख जैसे ऊंचे इलाकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर कस्टमाइज़ किया गया था। यह इंजन तेजस Mk1A के पूरे बेड़े को ताकत देगा, जो 2050 के दशक तक सेवा में रहेगा।भारत ने इसके लिए बड़े सौदे किए हैं:
- 2021: 99 इंजनों का अनुबंध (करीब ₹5,375 करोड़)।
- नवंबर 2025: 113 और इंजनों का सौदा (लगभग $1 बिलियन), जिनकी डिलीवरी 2027 से शुरू होकर 2032 तक पूरी होगी।
आखिर भारत में क्यों नहीं बन रहा F404?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई ऐतिहासिक और रणनीतिक कारण हैं:1. उत्पादन में लंबा अंतराल (Production Gaps):इतिहास गवाह है कि GE ने तेजस Mk1 के लिए शुरुआती इंजन (2016 तक करीब 65 यूनिट) देने के बाद इसका उत्पादन बंद कर दिया था। उस समय भारत की ओर से कोई नया बड़ा ऑर्डर नहीं था। जब 2021 में भारत ने अचानक बड़े ऑर्डर दिए, तो GE को अपनी बंद पड़ी लाइनों को फिर से शुरू करने में भारी मशक्कत करनी पड़ी। कोरोना महामारी और सप्लाई चेन की दिक्कतों ने इसे और जटिल बना दिया।
2. पुराने समझौतों में 'तकनीक' गायब:F404 के लिए किए गए पुराने सौदे केवल 'खरीद और सहयोग' (Direct Supply) पर आधारित थे, न कि निर्माण पर। यह 1970 के दशक का डिज़ाइन है और अब दुनिया भर में इसकी मांग घट रही है क्योंकि देश नए F414 इंजन की ओर बढ़ रहे हैं। इसलिए, GE ने कभी भी F404 के लिए भारी-भरकम टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) की पेशकश नहीं की, जैसा कि अब F414 के लिए (2023 MoU के तहत) किया जा रहा है।
3. भविष्य पर नजर (Strategic Shift):भारत का रणनीतिक फोकस अब अगली पीढ़ी के इंजनों पर है। F414 इंजन, जो ज्यादा ताकतवर (98 kN) है, तेजस Mk2 और AMCA के लिए जरूरी है। नीति-निर्माताओं को लगा कि एक पुराने (Legacy) इंजन के लिए देश में नई फैक्ट्री लगाने में संसाधन खर्च करने के बजाय, उस पैसे और ऊर्जा को 'कावेरी इंजन' (स्वदेशी इंजन) या F414 के सह-निर्माण में लगाना बेहतर होगा।
4. GE का नजरिया:GE ने भारत के लिए अपनी लाइन फिर से शुरू तो की, लेकिन बहुत धीमी गति से। 2025 में सिर्फ 12 इंजन, 2026 से सालाना 20 और 2027 तक 24 इंजन बनाने का लक्ष्य रखा गया। कंपनी को शायद यह भी लगता है कि 2032 के बाद भारत के बाहर इस पुराने इंजन का कोई बड़ा खरीदार नहीं मिलेगा, इसलिए भारत में प्लांट लगाना उनके लिए फायदेमंद नहीं था।
भविष्य के खतरे: क्या हम गलती कर रहे हैं?
भले ही यह फैसला कागजों पर सही लगे, लेकिन लंबी अवधि में यह भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है:- कलपुर्जों का संकट (Spares Crisis): लड़ाकू विमानों के इंजन एक निश्चित समय के बाद बदलने पड़ते हैं। 2040 या 2050 के दशक में, जब तेजस Mk1A को नए इंजनों या पुर्जों की जरूरत होगी, तब तक अमेरिका में F404 का उत्पादन पूरी तरह बंद हो चुका होगा। उस समय उत्पादन फिर से शुरू करना या तो नामुमकिन होगा या बेहद महंगा।
- भू-राजनीतिक दबाव (Geopolitical Leverage): हाल ही में 2024-25 में इंजनों की डिलीवरी में हुई देरी ने साबित कर दिया है कि विदेशी निर्भरता कितनी जोखिम भरी हो सकती है। मार्च 2025 में पहले इंजन के आने से पहले भारत को कई बार इंतजार करना पड़ा। अगर भविष्य में कोई कूटनीतिक तनाव होता है, तो हमारी वायुसेना की रीढ़ (तेजस फ्लीट) जमीन पर आ सकती है।
- लागत और तैयारी: जैसे-जैसे इंजन पुराना होगा, इसके विदेशी स्पेयर पार्ट्स महंगे होते जाएंगे, जिससे विमानों की 'उपलब्धता' (Availability) कम हो सकती है।
निष्कर्ष
तर्क यह कहता है कि जो इंजन (F404) हमारी वायुसेना के सबसे बड़े बेड़े को 30 साल तक उड़ाने वाला है, उसका निर्माण भारत में ही होना चाहिए था – ताकि स्पेयर पार्ट्स और मरम्मत (MRO) पर हमारा पूरा नियंत्रण होता।लेकिन विडंबना यह है कि हम उस विमान (Tejas Mk2/AMCA) के इंजन के लिए इकोसिस्टम बना रहे हैं जो 2030 के मध्य में आएगा, जबकि जो विमान आज हमारी सरहदों की रक्षा के लिए तैयार खड़ा है, उसकी डोर अब भी विदेशी हाथों में है।