'प्राकृतिका फेस्टिवल' में महिला किसानों का खास संदेश: जैविक खेती ही है स्वस्थ जीवन और समृद्धि का आधार

महिला किसानों ने बताया क्यों है खास ‘प्राकृतिका फेस्टिवल


पटना, 9 फरवरी। पटना के पाटलिपुत्र में ‘प्राकृतिका 2026’ कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य शहरी लोगों को जैविक खेती और प्राकृतिक जीवनशैली के प्रति जागरूक करना है। इस कार्यक्रम में कई राज्यों से आए किसानों ने स्टॉल लगाए हैं, जहां वे लोगों को अपने ऑर्गेनिक उत्पादों के बारे में जानकारी दे रहे हैं और जैविक खेती के लाभ बता रहे हैं।

समस्तीपुर जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली महिला किसान अंशु ने बताया कि खेती-किसानी के क्षेत्र में काम करते हुए मैं न सिर्फ अपनी आजीविका चला रही हूं, बल्कि अपनी सेहत और अपने समुदाय की सेहत को लेकर भी लगातार प्रयास कर रही हूं। मुझे यह महसूस हुआ कि मेहनत से जो कमाई होती है, उसका बड़ा हिस्सा बीमारियों और इलाज में चला जाता है। इसी सोच ने मुझे खेती को सिर्फ उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन से जोड़ने के लिए प्रेरित किया। इसलिए मैंने जैविक खेती, बहुफसली खेती, पशुपालन और प्राकृतिक तरीकों को अपनाया है। मैं अपने गांव में इन प्रयोगों के जरिए लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही हूं कि अगर खेती सही तरीके से की जाए, तो यह हमारी आय भी बढ़ा सकती है और सेहत भी सुधार सकती है।

मध्य प्रदेश से आई महिला किसान मुनिया ने कहा कि मैंने यह संकल्प लिया है कि गांवों के पारंपरिक देशी बीज, जो समय के साथ लगभग लुप्त हो चुके हैं, उन्हें बचाया जाए और फिर से खेती में लाया जाए। इसके लिए हम किसानों को लगातार प्रेरित करते हैं और जिनके पास ये बीज नहीं हैं, उन्हें हम स्वयं उपलब्ध कराते हैं। आज हमारे पारंपरिक बीज-जो कभी हमारी पहचान थे-लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। खासकर मिलेट्स जैसे कोदो, कुटकी, मड़िया, गंगनी, सांवा, ज्वार, बाजरा, मक्का और हमारी देशी दालें व पारंपरिक सब्ज़ियां-ये सभी धीरे-धीरे खेतों से गायब हो रही थीं।

उन्होंने कहा कि लोग बाजरे को गरीबों का खाना या पक्षियों का खाना कहते थे, लेकिन अब बाजरे के बारे में लोग जानने लगे हैं और उन्हें यकीन होने लगा कि इसमें बहुत पोषण होता है। इसे शहरी लोगों ने भी अपनाया है, ज्यादा से ज्यादा लोग जानें, सेहत के बारे में जानें, और एक मेन्यू में इसे शामिल करें।

महिला किसान निक्की ने बताया कि प्रकृति का एक खाना और बीज विविधता फेस्टिवल है। तो, जब हम फूड फेस्टिवल कहते हैं, तो हम पारंपरिक खाने की बात कर रहे होते हैं। बिहार का पारंपरिक खाना, दूसरे राज्यों का पारंपरिक खाना, और कुछ दूसरे राज्यों से भी प्रेजेंटेशन है। हमें लगता है कि 20 राज्यों से प्रेजेंटेशन आया है। इसी तरह से आप यहां देखेंगे तो सीड के स्टॉल भी लगाए गए हैं। यहां हम बिहार के पारंपरिक व्यंजनों पर तो ध्यान देते ही हैं, साथ ही देश के अन्य राज्यों के पारंपरिक भोजन को भी एक मंच पर लाते हैं। इस बार हमारे पास करीब 20 राज्यों से प्रस्तुतियां आई हैं। यानी यह फेस्टिवल पूरे देश के पारंपरिक खाद्य व्यंजनों का एक साझा संगम है।
 

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