संसाधनों के सैन्यीकरण के बीच गिलगित-बाल्टिस्तान की निराश जनता को झूठे सपने दिखा रहे हैं मुनीर

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पाकिस्तान अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान (पीओजीबी) में संसाधन प्रबंधन का बढ़ता सैन्यीकरण इस बात को दर्शाता है कि इस्लामाबाद आर्थिक केंद्रीकरण की नीति पर लगातार आगे बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र को सामाजिक-आर्थिक रूप से मुख्यधारा से जोड़ने के बजाय एक रणनीतिक बफर ज़ोन के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) विकास का वादा लेकर आया था, लेकिन इसके चलते स्थानीय लोगों में निराशा और गहरी होती चली गई।

अफगान डायस्पोरा नेटवर्क की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने एक बार फिर यह दावा दोहराया है कि देश की समृद्धि उसकी ज़मीन के नीचे छिपी है। उन्होंने लगभग 6 ट्रिलियन डॉलर के खनिज संसाधनों के दोहन की योजना का खाका पेश करते हुए कहा है कि पीओजीबी और खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में दुर्लभ खनिजों की खोज पाकिस्तान को आर्थिक संकट से उबार सकती है।

रिपोर्ट में कहा गया, “यह कथानक निराश जनता को उम्मीद बेचता है, लेकिन इस बयानबाजी के पीछे संस्थागत अतिक्रमण, संसाधनों का सैन्यीकरण और पाकिस्तान के सीमांत क्षेत्रों की लगातार उपेक्षा का गहरा पैटर्न छिपा हुआ है।” रिपोर्ट के अनुसार, इस नए खनन अभियान के केंद्र में स्पेशल फैसिलिटेशन इन्वेस्टमेंट काउंसिल है, जो एक सैन्य-प्रभावित निकाय है और विदेशी निवेश आकर्षित करने के नाम पर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए बनाया गया था।

हालांकि, रिपोर्ट का दावा है कि वास्तविकता में एसआईएफसी रणनीतिक क्षेत्रों, खासकर खनिज और ऊर्जा संसाधनों पर सेना के नियंत्रण को मजबूत करने का माध्यम बन गया है।

रिपोर्ट में बताया गया कि 25 अप्रैल, 2025 को एसआईएफसी ने माइनिंग एंड मिनरल संशोधन अधिनियम 2025 का मसौदा तैयार कर उसे लागू कराया, जिससे खनन से जुड़े अधिकार संघीय सरकार के पास केंद्रित हो गए। यह संघीय ढांचा अब सीधे तौर पर सेना के प्रभाव में काम कर रहा है, जिससे क्षेत्रीय प्रशासन को हाशिये पर धकेल दिया गया और मौजूदा नियंत्रण व संतुलन की व्यवस्था कमजोर हो गई।

इसके अलावा, पाकिस्तान की संघीय सरकार ने 15 अगस्त, 2024 को अधिसूचित पीओजीबी माइनिंग कंसेशन रूल्स 2024 में संशोधन किया, जिससे इस्लामाबाद का नियंत्रण और मजबूत हुआ और पीओजीबी की प्रशासनिक स्वायत्तता सीमित हो गई। इस फैसले से पूरे क्षेत्र में भारी आक्रोश फैल गया।

रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2025 में शिगर घाटी में वर्षों का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन देखने को मिला, जिसका नेतृत्व के-2 एक्शन कमेटी ने किया। स्थानीय निवासियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और व्यापारियों ने सड़कों पर उतरकर “कब्जे पर कब्जा नामंजूर” जैसे नारे लगाए।

रिपोर्ट में कहा गया कि यह विरोध केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं था, बल्कि दशकों से चले आ रहे शोषण, उपेक्षा और राजनीतिक हाशियाकरण के खिलाफ एक व्यापक प्रतिरोध का प्रतीक था।
 

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