आर्मी एयर डिफेंस डे : भारतीय रक्षा तंत्र की अभेद्य ढाल, जिसके सामने हर प्रहार फेल

आर्मी एयर डिफेंस डे  भारतीय रक्षा तंत्र की अभेद्य ढाल जिसके सामने हर प्रहार फेल-1.webp


10 जनवरी एक ऐसा दिन है, जब भारत अपने उन योद्धाओं को सलाम करता है, जो पलक झपकते ही दुश्मन के हवाई मंसूबों को राख में बदलने की शक्ति रखते हैं। आइए जानते हैं कैसे एक 'एंटी-एयरक्राफ्ट ट्रेनिंग सेंटर' से शुरू हुआ सफर आज 'आकाशतीर' जैसी डिजिटल शक्ति तक जा पहुंचा है।

तारीख थी 1971 के युद्ध की। आसमान में पाकिस्तान के अत्याधुनिक 'साबर जेट' अपनी रफ्तार का खौफ दिखा रहे थे। तभी नीचे जमीन पर तैनात एक भारतीय गनर, अरुमुगम पी. ने अपनी मशीन गन की नाल आसमान की ओर मोड़ी। बिना किसी उन्नत रडार के, केवल सटीक अनुमान और फौलादी इरादों के दम पर उन्होंने उस जेट को मार गिराया। यह केवल एक विमान का गिरना नहीं था, यह उस 'आर्मी एयर डिफेंस' (एएडी) की दहाड़ थी, जिसे आज हम दुनिया की सबसे घातक वायु रक्षा शक्तियों में से एक मानते हैं।

भारतीय सेना में वायु रक्षा की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध में छिपी हैं। 1939 में जब जापानी सेना का खतरा बढ़ा, तब अंग्रेजों ने महसूस किया कि जमीन की लड़ाई जीतने के लिए आसमान पर नजर जरूरी है।

15 सितंबर 1940 को कोलाबा (मुंबई) में भारत के पहले 'एंटी-एयरक्राफ्ट ट्रेनिंग सेंटर' की नींव पड़ी। 1947 में जब देश बंटा, तो सेना की वायु रक्षा संपत्तियां भी बंट गईं। भारत के हिस्से में केवल दो रेजिमेंट (26 और 27) आईं। लगभग शून्य से शुरू हुआ यह सफर 10 जनवरी 1994 को तब अपनी मंजिल पर पहुंचा, जब इसे आर्टिलरी से अलग कर एक स्वतंत्र कोर का दर्जा दिया गया।

आज की एएडी कोर केवल बंदूकों का समूह नहीं है, बल्कि यह 'ट्विन-ट्रैक' रणनीति पर काम करने वाली एक हाई-टेक फोर्स है।

पुरानी पड़ चुकी एल/70 गन और शिल्का टैंकों को रडार और डिजिटल सेंसरों से लैस किया गया है। 'आकाश' और 'एसआरएसएएम' जैसी मिसाइलें अब कोर की पहचान बन चुकी हैं।

भविष्य के युद्ध अब केवल गोलियों से नहीं, बल्कि 'डेटा' से लड़े जाएंगे। प्रोजेक्ट आकाशतीर एएडी कोर की वह डिजिटल रीढ़ है, जो देश के सभी रडारों और मिसाइल यूनिट्स को एक धागे में पिरोती है। यह प्रणाली पल-भर में बता देती है कि आसमान में उड़ने वाली चीज 'दोस्त' है या 'दुश्मन'। 2026 को सेना ने 'नेटवर्किंग और डेटा-सेंट्रिसिटी का वर्ष' घोषित किया है, जिसका नेतृत्व एएडी कोर ही कर रही है।

मई 2025 के 'ऑपरेशन सिंदूर' ने दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय वायु रक्षा कोर क्यों खास है। दुश्मन ने दर्जनों चीनी ड्रोनों और लघु-दूरी की मिसाइलों से हमला किया, लेकिन एएडी की 23 मिमी ट्विन बैरल गन और आकाशतीर नेटवर्क ने उन्हें सीमा पार करने से पहले ही ध्वस्त कर दिया। इस युद्ध ने साबित किया कि भविष्य 'ड्रोन-केंद्रित' है और भारत इसके लिए तैयार है।

ओडिशा के गोपालपुर में स्थित 'सेना वायु रक्षा कॉलेज' (एएडीसी) किसी मंदिर से कम नहीं है। यह संस्थान आधुनिक सिमुलेटर और लाइव-फायर रेंज से लैस है। यहां गनर्स को न केवल निशाना लगाना सिखाया जाता है, बल्कि उन्हें इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का मास्टर भी बनाया जाता है।

प्रतिवर्ष 10 जनवरी को जब 'सेना वायु रक्षा दिवस' मनाया जाता है, तो नजारा देखने लायक होता है। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।

आज जब युद्ध के मैदान में 'कामिकेज ड्रोन' और 'लॉइटरिंग म्युनिशन' जैसे नए खतरे मंडरा रहे हैं, तब हमारी एएडी कोर 'अश्वनी' जैसी विशेष ड्रोन यूनिट्स के साथ मिलकर एक ऐसा सुरक्षा चक्र तैयार कर रही है जिसे भेदना नामुमकिन है।
 

Latest Replies

Forum statistics

Threads
6,711
Messages
6,743
Members
18
Latest member
neodermatologist
Back
Top