नई दिल्ली, 6 फरवरी। पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के राज्य नेतृत्व की ओर से आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले बार-बार की गई एकता की कोशिशों पर कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद दोनों दलों के बीच बंटवारा तय माना जा रहा था।
इससे यह भी साफ हो गया है कि विपक्षी दलों का गठबंधन, जिसे तीन साल से भी कम समय पहले बड़े जोर-शोर से इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) ब्लॉक के रूप में पेश किया गया था, पश्चिम बंगाल में सफल नहीं हो पाएगा।
अब राज्य में कई दलों के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलेगा, जिसका फायदा मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिल सकता है। राज्य की 80 से 90 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटरों का असर पड़ सकता है, जबकि 40 से 50 सीटों पर वे निर्णायक भूमिका में हैं।
यह जनसांख्यिकीय स्थिति राज्य की राजनीति को काफी प्रभावित करती है और कई राजनीतिक दल इसका लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। अब तक मुस्लिम वोटरों का झुकाव राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की ओर रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस समुदाय के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं भी शुरू की हैं।
हालांकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का हालिया “सॉफ्ट हिंदुत्व” की ओर झुकाव अल्पसंख्यक वोटों में बंटवारा कर सकता है। राज्य में सरकारी खर्च से बने बड़े और चर्चित मंदिरों का उद्घाटन करना, और दुर्गा पूजा आयोजकों को सरकारी फंड से उदार मदद देना, भाजपा से बहुसंख्यक समुदाय को दूर रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
इस बार आने वाले विधानसभा चुनावों में कई राजनीतिक पार्टियों के मैदान में उतरने की संभावना है, जो खुले तौर पर धर्म के आधार पर अपनी राजनीतिक ताकत दिखा रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर ने जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) की शुरुआत की है। वे बाबरी मस्जिद की करोड़ों रुपए की प्रतिकृति बनवाने को लेकर चर्चा में रहे हैं। उनका मकसद चुनाव नतीजों के बाद किंगमेकर की भूमिका निभाना है।
जहां ममता बनर्जी के हालिया कदम उन्हें अपने पारंपरिक वोट बैंक से कुछ हद तक दूर कर सकते हैं, वहीं हुमायूं कबीर के पीछे मुस्लिम वोटों का एकजुट होना जरूरत पड़ने पर चुनाव बाद गठबंधन बनाने में मददगार हो सकता है।
इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) भी फिर से सक्रिय है। इस पार्टी की स्थापना फुरफुरा शरीफ सूफी दरगाह के मौलवी पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले की थी। उस समय पार्टी ने कांग्रेस और वाम दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इस बार भी पार्टी का दावा है कि वह राज्य में मुसलमानों और दलितों के लिए “सामाजिक न्याय” की लड़ाई लड़ेगी।
उधर, हैदराबाद स्थित एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, बिहार के मुस्लिम-बहुल इलाकों में पिछले साल मिली सफलता के बाद अब पश्चिम बंगाल की राजनीतिक जमीन को परखने की तैयारी में हैं।
हुमायूं कबीर इस्लामिक पार्टियों के संभावित गठबंधन पर जोर दे रहे हैं, ताकि चुनाव के बाद उनकी सौदेबाजी की ताकत बढ़ सके। इसी बीच विपक्ष में फूट तब और साफ हो गई, जब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी की जगह शुभंकर सरकार को नियुक्त किया गया।
जहां पहले वाले नेता को ममता बनर्जी का कड़ा विरोधी माना जाता था, वहीं मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष को अपेक्षाकृत नरम रुख वाला नेता माना जा रहा है। इसी सोच के चलते कांग्रेस ने आखिरकार लेफ्ट फ्रंट और आईएसएफ के साथ अपना गठबंधन तोड़ने का फैसला किया। पार्टी के भीतर एक बड़े वर्ग का मानना था कि इस गठबंधन से कांग्रेस को नुकसान हुआ है और पार्टी और कमजोर हुई है।
पिछले चुनावों में इस गठबंधन से कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं मिला। बाद में जब तृणमूल कांग्रेस से बातचीत हुई, तो उसने केवल बहुत सीमित सीटों पर समझौते की पेशकश की। 2025 से अब तक हुई कई राजनीतिक घटनाओं और संकेतों से यह साफ हो गया कि बंटवारा तय है। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस ने सभी 294 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसी बीच सीपीआई(एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम की हाल ही में हुमायूं कबीर से मुलाकात भी चर्चा में रही।
अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल के बहरामपुर लोकसभा क्षेत्र से लगातार पांच बार सांसद रह चुके हैं और 17वीं लोकसभा में कांग्रेस के नेता भी थे। लेकिन, 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार यूसुफ पठान से हार का सामना करना पड़ा।
राज्य कांग्रेस के एक धड़े ने अधीर रंजन चौधरी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर आगे बढ़ाया है। हालांकि यह साफ नहीं है कि पार्टी अपने दम पर कितनी सीटें जीत पाएगी। खुद चौधरी अभी बिना किसी आधिकारिक घोषणा के इस भूमिका को लेकर हिचकिचा रहे हैं। लेकिन, संभावना है कि वे विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं, खासकर मुर्शिदाबाद जिले से। 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट गठबंधन 294 सदस्यीय विधानसभा में एक भी सीट जीतने में नाकाम रहा था, जबकि उनकी सहयोगी पार्टी आईएसएफ को सिर्फ एक सीट मिली थी।
कुल मिलाकर, इंडिया गठबंधन—जिसमें कांग्रेस, सीपीआई(एम), डीएमके, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, शिवसेना (यूबीटी) और आरजेडी सहित 28 विपक्षी दल शामिल हैं—2024 के लोकसभा चुनावों के बाद लगातार झटकों का सामना कर रहा है। इसके बाद महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में भी उसे हार मिली, जिससे यह गठबंधन धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिख रहा है।
हालांकि, पश्चिम बंगाल में बीजेपी इस राजनीतिक स्थिति का कितना फायदा उठा पाएगी, यह अभी साफ नहीं है। राज्य में उसके पास न तो कोई मजबूत क्षेत्रीय नेता है और न ही पूरी तरह एकजुट पार्टी संगठन।