पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर? कर्ज का बोझ जीडीपी के 70.7 फीसदी हुआ, खतरे में अर्थव्यवस्था

पाकिस्तान सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़कर जीडीपी के 70.7 फीसदी पर पहुंचा: रिपोर्ट


नई दिल्ली, 6 फरवरी। पाकिस्तान सरकार का कर्ज बोझ तेजी से बढ़ता जा रहा है। कराची स्थित अखबार बिजनेस रिकॉर्डर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार के नवीनतम ‘डेट पॉलिसी स्टेटमेंट 2026’ में खुलासा हुआ है कि वित्त वर्ष 2024-25 में देश का सार्वजनिक कर्ज तय कानूनी सीमा से कहीं अधिक बढ़ गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में पाकिस्तान का सार्वजनिक कर्ज संसद द्वारा तय 56 फीसदी की अधिकतम सीमा को पार करते हुए जीडीपी के 70.7 फीसदी तक पहुंच गया। इसका मतलब है कि सार्वजनिक कर्ज वैधानिक सीमा से 16.8 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये अधिक हो गया, जो जीडीपी के हिसाब से करीब 14.7 फीसदी अतिरिक्त है। यह स्थिति सरकार की वित्तीय अनुशासन लागू करने में लगातार नाकामी को दर्शाती है।

बिजनेस रिकॉर्डर के लेख में कहा गया है कि यह उल्लंघन पाकिस्तान की शासन व्यवस्था में एक गहरी संरचनात्मक खामी को उजागर करता है, जहां पहले खर्च किया जाता है, फिर उस खर्च को पूरा करने के लिए और अधिक कर्ज लिया जाता है और बाद में उसके लिए तर्क गढ़े जाते हैं।

लेख में यह भी कहा गया है कि वित्तीय अनुशासन लागू करने के लिए बनाए गए नियमों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। आमतौर पर संसद को तब जानकारी दी जाती है जब कर्ज और घाटे की सीमाएं पहले ही पार हो चुकी होती हैं और कार्यपालिका को इसके लिए किसी तत्काल परिणाम का सामना नहीं करना पड़ता। लेख के मुताबिक, देश का आर्थिक मॉडल अब भी उपभोग आधारित है, सुधारों के प्रति उदासीन है और कर्ज पर अत्यधिक निर्भर बना हुआ है।

इसका सीधा असर यह हुआ है कि अब केंद्रीय बजट का लगभग आधा हिस्सा केवल कर्ज की अदायगी में खर्च हो रहा है। इससे विकास कार्यों के लिए उपलब्ध धन लगातार घट रहा है, सार्वजनिक क्षेत्र विकास कार्यक्रम (पीएसडीपी) कमजोर हो रहा है और पहले से ही बोझ झेल रही जनता पर और अधिक कर लगाए जा रहे हैं।

पिछले तीन वर्षों में घरेलू कर्ज की अदायगी सरकारी खर्च बढ़ने का सबसे बड़ा कारण बन गई है, जिससे विकास योजनाओं पर खर्च सिमट गया है और अर्थव्यवस्था को कर्ज के जाल से बाहर निकालने के लिए जरूरी उत्पादक निवेश प्रभावित हुआ है। ऐसे हालात में वित्त मंत्रालय द्वारा संसद को दिए गए आश्वासन खोखले नजर आते हैं।

हालांकि पाकिस्तान सरकार ने यह स्वीकार किया है कि पिछले वित्त वर्ष में कर्ज-से-जीडीपी अनुपात और खराब हुआ है, लेकिन सरकार का दावा है कि वह वित्तीय जिम्मेदारी और ऋण सीमा अधिनियम का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार का कहना है कि वह वित्तीय सख्ती, प्राथमिक अधिशेष पैदा करने और राजकोषीय घाटे में धीरे-धीरे कमी लाकर सार्वजनिक कर्ज को टिकाऊ स्तर पर लाएगी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष के शुरुआती संकेत भी उत्साहजनक नहीं हैं। फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (एफबीआर) जुलाई से जनवरी की अवधि में अपने राजस्व लक्ष्य से 347 अरब पाकिस्तानी रुपये पीछे रह गया है, जबकि सरकार कर्ज के दबाव को कम दिखाने के लिए वित्तीय इंजीनियरिंग पर और अधिक निर्भर होती जा रही है।
 

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