बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का भविष्य खतरे में! बढ़ती इस्लामवादी विचारधारा और सरकार की अनदेखी पर सनसनीखेज रिपोर्ट का खुलासा

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का भविष्य अनिश्चित, इस्लामवादी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव पर रिपोर्ट


ब्रुसेल्स, 5 फरवरी। बांग्लादेश जैसे-जैसे 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे देश का भविष्य, खासकर अल्पसंख्यकों के लिए, लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अल्पसंख्यकों को ऐसी सरकार का सामना करना पड़ सकता है, जो उन्हें समान नागरिक के रूप में मान्यता नहीं देती।

रिपोर्ट में इस स्थिति के लिए मुख्य रूप से मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया है। कहा गया है कि शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन को संभालने के बजाय इस सरकार ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया, कारोबारी समूहों के खिलाफ अवैध कार्रवाई की, अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों को नजरअंदाज किया, सामाजिक विभाजन को और गहरा किया तथा बढ़ते इस्लामवादी खतरे पर आंखें मूंद लीं।

अमेरिका-बांग्लादेश संबंधों पर एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए ब्रुसेल्स स्थित समाचार वेबसाइट ‘ईयू रिपोर्टर’ ने एक लीक ऑडियो का खुलासा किया है, जिसमें ढाका में तैनात एक अमेरिकी राजनयिक को यह कहते हुए सुना गया कि वह जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश का “मित्र” बनाना चाहता है।

हालांकि उभरते राजनीतिक दलों के साथ कूटनीतिक संबंध बनाना असामान्य नहीं है, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश का सबसे बड़ा इस्लामवादी दल है और रूस ने इसे 20 से अधिक वर्षों से प्रतिबंधित आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।

रिपोर्ट में कहा गया, “एक दशक से अधिक समय पहले हिंदू विरोधी हिंसा के बाद चुनावी पंजीकरण खोने के बावजूद, बांग्लादेश में आम चुनाव से महज एक महीने पहले जमात दूसरे स्थान पर बताई जा रही है। यदि अमेरिका खुलकर जमात के पक्ष में खड़ा होता है, तो यह एक बुनियादी बदलाव होगा और संभवतः हाल के वर्षों में अमेरिकी विदेश मंत्रालय की सबसे बड़ी गलतियों में से एक साबित हो सकता है।”

रिपोर्ट के अनुसार, “जमात की उत्पत्ति बांग्लादेश के गठन के विरोध में हुए आंदोलन से हुई थी और यह मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रेरित है। भारत के विभाजन के बाद जमात ने पाकिस्तान का साथ दिया। बांग्लादेश की मुक्ति संग्राम के दौरान जमात ने क्रूर अर्धसैनिक समूह बनाए, जिन्होंने स्वतंत्रता समर्थक नागरिकों को निशाना बनाया।”

रिपोर्ट में बताया गया कि 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद कार्यकारी आदेश के जरिए जमात पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया। इसके बाद 2025 में एक बांग्लादेशी अदालत के फैसले से जमात को दोबारा राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण मिल गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, वापसी के बाद जमात ने बांग्लादेश की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की है और उसका प्रभाव लगातार बढ़ा है। जमात की बढ़ती लोकप्रियता से देश में रूढ़िवादी इस्लामी सोच के मजबूत होने की आशंका भी बढ़ गई है, खासकर ऐसे समय में जब समाज में विभाजन गहराता जा रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जुलाई 2024 के प्रदर्शनों के बाद से बांग्लादेश में महिलाओं को निशाना बनाकर भीड़ हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं, लड़कियों के खेल मुकाबले रद्द किए गए हैं और देशभर में महिलाओं व बच्चों के साथ कई बर्बर बलात्कार की घटनाएं हुई हैं।

रिपोर्ट ने कहा, “जिस देश को महिला नेतृत्व के लिए जाना जाता रहा है, वहां इस तरह की गिरावट बेहद चिंताजनक है।”

रिपोर्ट में आगे कहा गया, “एक ऐसे देश में जो धार्मिक आधार पर गहराई से बंट चुका है, रोहिंग्या शरणार्थी संकट के लगातार प्रभावों से जूझ रहा है और भारत के साथ संबंधों में तनाव का सामना कर रहा है, ये चुनाव शायद वह उम्मीद नहीं दे पाएंगे, जिसकी कई लोग अपेक्षा कर रहे हैं।”
 

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