एनसीएलटी ने अल्केमिस्ट ग्रुप के दिवालियापन को किया रद्द, ईडी के हस्तक्षेप से मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश नाकाम

एनसीएलटी ने अल्केमिस्ट ग्रुप के दिवालियापन को किया रद्द, ईडी के हस्तक्षेप से मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश नाकाम


नई दिल्ली, 5 फरवरी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को अल्केमिस्ट ग्रुप के मामले में बड़ी सफलता मिली है। राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने 3 फरवरी के अपने आदेश में अल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ चल रही कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) को पूरी तरह वापस ले लिया। ट्रिब्यूनल ने माना कि यह प्रक्रिया धोखाधड़ी, साजिश और गलत इरादे से शुरू की गई थी।

ईडी की जांच से पता चला था कि अल्केमिस्ट ग्रुप की कंपनियां, जैसे अल्केमिस्ट होल्डिंग्स लिमिटेड और अल्केमिस्ट टाउनशिप इंडिया लिमिटेड, ने निवेशकों से उच्च रिटर्न, प्लॉट, विला या फ्लैट देने के नाम पर 1840 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम जुटाई, लेकिन निवेशकों को न तो संपत्ति दी गई और न ही उनका पैसा लौटाया गया। यह रकम ग्रुप की अन्य कंपनियों, खासकर अल्केमिस्ट लिमिटेड में इंटर-कॉर्पोरेट डिपॉजिट (आईसीडी) के रूप में डायवर्ट कर दी गई। ईडी ने 2021 से लेकर 2025 तक अभियोजन शिकायतें दायर कीं और 492.72 करोड़ रुपए की संपत्तियां कुर्क कीं।

सीआईआरपी की शुरुआत साई टेक मेडिकेयर प्राइवेट लिमिटेड ने आईबीसी की धारा 9 के तहत की थी, लेकिन लेनदारों की समिति में अल्केमिस्ट ग्रुप की ही कंपनियां हावी थीं। इसमें टेक्नोलॉजी पार्क्स लिमिटेड के पास 97 प्रतिशत वोटिंग अधिकार थे, जबकि अन्य ग्रुप कंपनियां जैसे अल्केमिस्ट टाउनशिप इंडिया लिमिटेड और अल्केमिस्ट रियल्टी लिमिटेड भी शामिल थीं। ये सभी कंपनियां ईडी की जांच में आरोपी थीं और अपराध की कमाई से जुड़ी हुई थीं। ईडी ने ट्रिब्यूनल को सबूत दिए कि दिवालियापन प्रक्रिया का इस्तेमाल कुर्क की गई संपत्तियों को छुड़ाने और आईबीसी की धारा 32ए के तहत छूट पाने के लिए किया जा रहा था। साथ ही, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल के रूप में ग्रुप के पूर्व कर्मचारी गौरव मिश्रा को नियुक्त किया गया, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठे। ईडी को समय पर पक्षकार नहीं बनाया गया जो गलत मंशा दिखाता है।

एनसीएलटी ने ईडी की दलीलों को सही ठहराया। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कहा कि दिवालियापन और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) एक लाभकारी कानून है, जो असली दिवालियापन सुलझाने के लिए है, न कि अपराध की कमाई को साफ करने या पीएमएलए की कार्यवाही को रोकने के लिए। आईबीसी का दुरुपयोग करके मनी लॉन्ड्रिंग को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। सीओसी की स्वतंत्रता ग्रुप कंपनियों के नियंत्रण से खत्म हो गई थी। ऐसे में सीआईआरपी जारी रखना अपराध की कमाई को वैध बनाने और कुर्की को कमजोर करने जैसा होता। ट्रिब्यूनल ने आईबीसी की धारा 65 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया और प्रक्रिया को धोखाधड़ीपूर्ण बताया।

आदेश में सीआईआरपी वापस ले ली गई, धारा 14 के तहत लगी रोक हटा दी गई और रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति व उसकी सभी कार्रवाइयां रद्द कर दी गईं। ऑपरेशनल क्रेडिटर साई टेक मेडिकेयर पर 5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया। यह फैसला साफ करता है कि आईबीसी और पीएमएलए अलग-अलग कानून हैं और दोनों समानांतर चल सकते हैं, लेकिन एक कानून का दुरुपयोग दूसरे को नाकाम करने के लिए नहीं किया जा सकता। इससे निवेशकों के हितों की रक्षा और अपराध पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी।
 

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