इस्लामाबाद, 5 फरवरी। पाकिस्तान में बच्चों के यौन शोषण की समस्या लगातार गंभीर बनी हुई है, जो न केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बल्कि वास्तविक जीवन में भी व्यापक रूप से फैली हुई है। हाल ही में पाकिस्तान की संघीय जांच एजेंसी (एफआईए) के तहत राष्ट्रीय साइबर अपराध जांच एजेंसी ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसमें ब्लैकमेलिंग के जरिए बच्चों का शोषण किया जा रहा था। यह खुलासा एक रिपोर्ट में किया गया है।
इस कार्रवाई के दौरान एक मुख्य आरोपी को गिरफ्तार किया गया, जिसके पास से बच्चों से संबंधित 600 से अधिक आपत्तिजनक वीडियो बरामद किए गए। इस घटना ने यह सवाल खड़े कर दिए हैं कि ऑनलाइन स्पेस में इस तरह के विकृत तत्व किस तरह खुलेआम सक्रिय हैं, ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, जिन तक बच्चों और अपराधियों दोनों की पहुंच है। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के संपादकीय में इस पर गंभीर चिंता जताई गई है।
संपादकीय में सवाल उठाया गया, “सरकार ने बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं? माता-पिता को यह समझाने की जिम्मेदारी किसकी है कि वे बच्चों की सुरक्षा के लिए किन संकेतों पर ध्यान दें? ऐसे और नेटवर्क्स का पता लगाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?”
संपादकीय में कहा गया कि इन सवालों के जवाब हर नागरिक को मिलने चाहिए, लेकिन फिलहाल ऐसे स्पष्ट उत्तर नजर नहीं आते।
एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, पाकिस्तान में बच्चों का यौन शोषण केवल ऑनलाइन माध्यमों तक सीमित नहीं है, बल्कि भौतिक दुनिया में भी यह समस्या व्यापक है। जब शारीरिक यौन अपराधों के मामलों में भी सबूत जुटाना और दोषियों को सजा दिलाना मुश्किल होता है, तो ऑनलाइन अपराधियों को पकड़ने की उम्मीद और भी कमजोर हो जाती है, जो आसानी से अपनी पहचान और लोकेशन छुपा लेते हैं।
संपादकीय में यह भी उल्लेख किया गया कि दुनिया के कई देशों ने नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाए हैं या डिजिटल सुरक्षा को अपने शिक्षा पाठ्यक्रम का अहम हिस्सा बनाया है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में अब भी व्यक्तिगत स्तर की सावधानियों पर ही अधिक निर्भरता बनी हुई है, जबकि जरूरत एक व्यावहारिक और समग्र सरकारी नीति की है।
सितंबर 2025 में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में जनवरी से जून 2025 के बीच दर्ज बाल यौन शोषण (सीएसए) के मामलों में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
इस अवधि में कुल 1,956 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 605 अपहरण, 192 लापता बच्चे, 950 बाल यौन शोषण के मामले और 34 बाल या मुआवजा विवाह के मामले शामिल थे। यह आंकड़े इस्लामाबाद स्थित गैर-सरकारी संगठन ‘साहिल’ की क्रूएल नंबरस रिपोर्ट में सामने आए हैं, जो 1996 से पाकिस्तान में बाल संरक्षण और बाल यौन शोषण के खिलाफ काम कर रहा है।
ग्रीक सिटी टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी इन आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि गहरी सामाजिक बदनामी, प्रतिशोध का डर और कानून प्रवर्तन एजेंसियों में व्याप्त कमजोरियां कई मामलों को सामने आने से रोकती हैं। रिपोर्ट में कहा गया, “अक्सर परिवार न्याय की मांग करने के बजाय चुप्पी साध लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बच्चों की रक्षा के लिए बनी व्यवस्था उन्हें दोबारा मानसिक आघात ही पहुंचाएगी।”
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मामलों में बढ़ोतरी के पीछे कई कारण हैं। एक ओर, साहिल और वॉयस पीके.नेट जैसे संगठनों द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियानों और बेहतर रिपोर्टिंग तंत्र के कारण मामलों की रिपोर्टिंग बढ़ी है। मीडिया कवरेज ने भी परिवारों को सामने आने के लिए प्रोत्साहित किया है।
हालांकि, केवल रिपोर्टिंग में सुधार ही इस बढ़ती संख्या की पूरी व्याख्या नहीं करता। रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और व्यापक गरीबी जैसे सामाजिक-आर्थिक दबावों ने कम आय वाले परिवारों के बच्चों को विशेष रूप से असुरक्षित बना दिया है। इन कमजोरियों को डिजिटल एक्सपोजर और भी बढ़ा रहा है, जहां बच्चे सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर शिकारी तत्वों के संपर्क में आ रहे हैं।
रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बच्चों की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान को अब केवल व्यक्तिगत सतर्कता पर निर्भर रहने के बजाय, एक मजबूत, संगठित और दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है।