जेल में अब कैदी भी कमाएंगे अच्छी खासी रकम! मजदूरी बढ़ोतरी के खिलाफ जनहित याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज

कैदियों की मजदूरी में बढ़ोतरी के खिलाफ जनहित याचिका खारिज, राज्य सरकार का फैसला बरकरार


कोच्चि, 5 फरवरी। केरल हाईकोर्ट ने गुरुवार को राज्य सरकार द्वारा दोषी कैदियों को दी जाने वाली मजदूरी में की गई कई गुना बढ़ोतरी को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया।

न्यायमूर्ति सौमेन सेन और न्यायमूर्ति वी.एम. श्याम कुमार की खंडपीठ ने अधिवक्ता ए.के. गोपी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए 9 जनवरी को जारी राज्य सरकार के कार्यकारी आदेश की वैधता को बरकरार रखा।

इस आदेश के तहत जेल श्रम के लिए दी जाने वाली दैनिक मजदूरी को पहले के 63 रुपये से 168 रुपये के दायरे से बढ़ाकर 530 रुपये से 620 रुपये के बीच कर दिया गया था।

याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि यह संशोधन मजदूरी में कई गुना वृद्धि है और कुछ श्रेणियों में यह बढ़ोतरी लगभग नौ गुना तक पहुंचती है। उनका कहना था कि नई दरों के अनुसार कैदी प्रतिमाह लगभग 15,000 रुपये से 18,600 रुपये तक कमा सकेंगे, जबकि भोजन, आवास, कपड़े और चिकित्सा जैसी सभी आवश्यक सुविधाएं राज्य सरकार पहले से ही नि:शुल्क उपलब्ध करा रही है।

याचिका में इसे “संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य आर्थिक उलटफेर” करार देते हुए तर्क दिया गया कि इससे कैदियों को स्वतंत्र श्रमिकों की तुलना में अधिक आर्थिक लाभ मिलेगा।

याचिकाकर्ता ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ गुजरात बनाम हाईकोर्ट ऑफ गुजरात [(1998) 7 एसएससी 392] का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जेल श्रम को पारंपरिक अर्थों में ‘रोजगार’ नहीं माना जा सकता और कैदियों को दी जाने वाली मजदूरी का उद्देश्य न्यूनतम मजदूरी के बराबर भुगतान नहीं, बल्कि समानता और प्रोत्साहन देना होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी थी कि राज्य द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए जेल मजदूरी ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे कैदी स्वतंत्र श्रमिकों से बेहतर आर्थिक स्थिति में आ जाएं।

याचिका में केरल सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के तहत जारी अधिसूचनाओं का भी उल्लेख किया गया, जिसमें अकुशल श्रमिकों के लिए 15,000 रुपये, अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए 15,720 रुपये और कुशल श्रमिकों के लिए 18,000 रुपये मासिक वेतन निर्धारित है, जबकि उन्हें आवास या भोजन जैसी कोई सब्सिडी नहीं मिलती।

इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को मिलने वाला मानदेय भी संशोधित जेल मजदूरी से कम है।

हालांकि, अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि अन्य श्रेणियों के कर्मचारियों के वेतनमान में संशोधन न होने के आधार पर राज्य सरकार को कैदियों की मजदूरी संशोधित करने से नहीं रोका जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि अन्य वर्गों को उचित माध्यमों से अपने वेतनमान में संशोधन की मांग करने की स्वतंत्रता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जेल में दी जाने वाली मजदूरी पुनर्वास प्रक्रिया का हिस्सा है। न्यायाधीशों ने कहा कि कैदियों को बिना काम के मजदूरी नहीं दी जा रही है और यह योजना उनके पुनर्वास और समाज में पुनः समावेशन के उद्देश्य से लागू की गई है।
 

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