भारत से श्रीलंका पहुंचे भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेष, राजकीय सम्मान संग भव्य प्रदर्शनी का शुभारंभ

श्रीलंका में भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेष की प्रदर्शनी का हुआ शुभारंभ


नई दिल्ली, 4 फरवरी। भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेष भारतीय वायुसेना के एयरक्राफ्ट सी-130जे से ऐतिहासिक प्रदर्शनी के लिए श्रीलंका पहुंच गए। पवित्र अवशेष को कोलंबो के गंगारामया मंदिर में रखा गया है और इसकी प्रदर्शनी का शुभारंभ भी हो गया।

पवित्र अवशेषों के साथ गुजरात के गवर्नर आचार्य देवव्रत और गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष संघवी के नेतृत्व में देवनीमोरी अवशेष को श्रीलंका में प्रदर्शनी के लिए लाया गया है। इसमें वरिष्ठ साधु और अधिकारी भी शामिल हैं।

तय प्रोटोकॉल और अवशेषों की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए भारतीय वायुसेना का स्पेशल एयरक्राफ्ट पूरे राजकीय सम्मान के साथ वहां पहुंचा। यह भारत की पवित्र विरासत को सम्मान के साथ बनाए रखने की भारत की भावना को दिखाता है।

भारत के प्रतिनिधिमंडल ने डिप्टी सीएम हर्ष संघवी के नेतृत्व में कोलंबो में सेरेमोनियल, धार्मिक और आधिकारिक कार्यक्रमों में भाग लिया। इसमें भारत की बौद्ध विरासत और आज के सांस्कृतिक जुड़ाव को दिखाने वाली प्रदर्शनी औपचारिक तौर पर उद्घाटन किया गया।

इससे पहले कोलंबो में भारतीय हाई कमीशन ने सोमवार को बताया कि पवित्र अवशेषों को 4 से 11 फरवरी तक कोलंबो के गंगारामया मंदिर में रखा जाएगा, और 5 फरवरी से सार्वजनिक पूजा शुरू होगी। 11 फरवरी को पवित्र अवशेष वापस लाया जाएगा।

अप्रैल 2025 में भारत के प्रधानमंत्री की श्रीलंका यात्रा के दौरान व्यक्त किए गए दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए भारत श्रीलंका में भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरि अवशेषों की प्रदर्शनी के माध्यम से आध्यात्मिक पहुंच और सांस्कृतिक कूटनीति की एक महत्वपूर्ण पहल है।

देवनीमोरि अवशेष गुजरात के अरावली जिले में शामलाजी के निकट स्थित देवनीमोरि पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुए हैं। यह ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व का स्थान है। पहली बार 1957 में पुरातत्वविद् प्रोफेसर एसएन चौधरी ने स्थल की खोज की थी।

पवित्र अवशेषों को अब एक डेसिकेटर में रखा गया है। इसे एयरटाइट कांच के भीतर सील किया गया है ताकि अंदर रखी वस्तुओं को और खराब होने से बचाया जा सके। अवशेषों को सोने की परत वाली चांदी-तांबे की बोतल और रेशमी कपड़े के साथ काटन बेस पर रखा गया है ताकि उनका बेहतर संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
 
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