देहरादून में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं पर हमले से बवाल, छात्र संघ-PDP ने पूछा: 'कश्मीरी होना गुनाह?' केंद्र से मांगी दखल

देहरादून में दो कश्मीरी शॉल विक्रेताओं पर हुए हमले का विरोध, जम्मू-कश्मीर छात्र संघ ने केंद्र से दखल की मांग की


श्रीनगर, 31 जनवरी। उत्तराखंड के देहरादून में दो कश्मीरी शॉल विक्रेताओं पर हुए हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में विपक्षी पार्टी पीडीपी और जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने विरोध किया है। इस हमले के विरोध में पीडीपी कार्यकर्ताओं ने रविवार को विरोध प्रदर्शन भी किया।

पीडीपी कार्यकर्ताओं ने श्रीनगर में पार्टी कार्यालय के सामने घाटी के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। पीडीपी नेता सारा नईमा ने कहा कि हमारे कश्मीरी बेटे को उत्तराखंड में पीटा गया और उस पर हमला किया गया। उसकी एकमात्र गलती यह है कि वह कश्मीरी लड़का है, वह मुसलमान है।

पार्टी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, "जब उत्तराखंड में एक जवान कश्मीरी शॉल बेचने वाले को लगभग पीट-पीटकर मार डाला जाता है, तो कोई भी उसे बचाने नहीं आता। लेकिन जब पीडीपी ऐसे अत्याचारों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने की कोशिश करती है, तो पूरे पुलिस सिस्टम को मार्च को कुचलने के लिए लगा दिया जाता है।"

उन्होंने कहा, "कश्मीरियों को अपने ही केंद्र शासित प्रदेश में कैद कर दिया गया है और जब वे ईमानदारी से रोजी-रोटी कमाने के लिए बाहर निकलते हैं, तो उन्हें पीटा जाता है। जब जिंदगी जीने को भी अपराध माना जाता है, तो कश्मीरी लोग कहां जाएं? क्या उन्हें नए भारत में रहने की भी इजाजत है?"

वहीं, जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा और दखल देने की मांग की।

केंद्रीय गृह मंत्री को लिखे पत्र में एसोसिएशन के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुएहामी ने कहा कि यह घटना देहरादून के विकास नगर इलाके में हुई, जहां किशोर अपने परिवार के साथ कड़ाके की सर्दी के महीनों में रोजी-रोटी कमाने के लिए शॉल बेच रहा था। एसोसिएशन के मुताबिक, युवक से पहले उसकी पहचान और मूल स्थान के बारे में पूछताछ की गई। यह पता चलने पर कि परिवार मुस्लिम समुदाय से है और कश्मीर से है, कथित तौर पर स्थिति गंभीर हिंसा में बदल गई। युवक को लोहे की रॉड से बेरहमी से पीटा गया, जिससे उसके बाएं हाथ में फ्रैक्चर हो गया और सिर में गंभीर चोटें आईं, जिसके लिए 13 टांके लगाने पड़े।

एसोसिएशन ने इस हमले को सिर्फ एक क्रिमिनल एक्ट नहीं, बल्कि पहचान पर आधारित हिंसा का एक गंभीर उदाहरण बताते हुए कहा कि यह घटना भारत के संवैधानिक मूल्यों, राष्ट्रीय एकता और अंदरूनी मेलजोल पर चोट करती है।
 

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