शहीद सुनील चौधरी के नाम हुआ कठुआ रेलवे स्टेशन, माता-पिता गर्व से बोले- बेटे की विरासत अमर रहेगी

शहीद सुनील चौधरी के नाम पर कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम, माता-पिता ने जताया गर्व, कहा-उनकी विरासत जिंदा रहेगी


श्रीनगर, 31 जनवरी। जम्मू-कश्मीर सरकार ने देश के वीर सपूत और कीर्ति चक्र से सम्मानित शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के सर्वोच्च बलिदान को सम्मान देते हुए कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम बदलने की मंजूरी दे दी है। अब यह स्टेशन आधिकारिक तौर पर 'शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी कठुआ रेलवे स्टेशन' के नाम से जाना जाएगा। इस फैसले से शहीद के परिवार में गर्व के साथ-साथ भावुकता भी देखने को मिली है।

सरकारी आदेश के अनुसार, सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से जारी आदेश के तहत कठुआ जिले में स्थित रेलवे स्टेशन का नाम बदला गया है। इस कदम को जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र बलों के बलिदान को सम्मान देने और उनकी शहादत को हमेशा याद रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

शहीद के पिता, सेवानिवृत्त कर्नल पीएल चौधरी ने सरकार के इस फैसले की सराहना की। उन्होंने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि शहीदों के नाम पर सार्वजनिक स्थानों का नाम रखना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है।

उन्होंने कहा, "सरकार ने मेरे बेटे की शहादत को सम्मान देने के लिए कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम उसके नाम पर रखने का निर्णय लिया है। रेलवे स्टेशन, स्कूल और खेल मैदान जैसे स्थानों का नाम शहीदों के नाम पर रखने से बच्चों में देश सेवा की भावना बचपन से ही जागती है।"

कर्नल चौधरी ने अपने सैन्य जीवन को याद करते हुए कहा कि सेना के परिवारों में बच्चे अक्सर वर्दी देखकर बड़े होते हैं और उसी से प्रेरित होकर देश सेवा का सपना देखते हैं।

उन्होंने कहा, "मैं खुद सेना में था, इसलिए हमारे घर का माहौल हमेशा सेना, नौसेना या वायुसेना की ओर झुका रहा। बच्चे वर्दी और हमारे काम को देखते हैं, और वही उनकी प्रेरणा बनता है। जब वे सशस्त्र बलों में जाते हैं, तो अक्सर बेहतर प्रदर्शन करते हैं।"

कैप्टन सुनील चौधरी की तैनाती असम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित तिनसुकिया क्षेत्र में थी। वहां तैनाती के महज तीन से चार महीनों के भीतर उन्होंने एक सफल अभियान का नेतृत्व किया, जिसमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (यूएलएफए) के दो आतंकियों को मार गिराया गया।

उनकी इस बहादुरी के लिए उन्हें 26 जनवरी 2008 को सेना मेडल से सम्मानित किया गया। इसके बाद वह उग्रवादी संगठन के लिए एक बड़ा खतरा माने जाने लगे।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 27 जनवरी 2008 को, यानी सेना मेडल मिलने के अगले ही दिन, उन्हें अपने कमांडिंग ऑफिसर कर्नल प्रमित सक्सेना द्वारा दीनजान में आयोजित एक सम्मान समारोह में शामिल होना था। इस कार्यक्रम में उनके साथ 19 पंजाब के लेफ्टिनेंट वरुण राठौर भी मौजूद रहने वाले थे।

इसी बीच खुफिया जानकारी मिली कि रंगागढ़ गांव में सात से नौ यूएलएफए आतंकी छिपे हुए हैं। कैप्टन चौधरी ने बिना एक पल गंवाए देश की सुरक्षा को वरीयता दी और तुरंत ऑपरेशन के लिए निकल पड़े।

इस मुठभेड़ में उन्होंने दो आतंकियों को मार गिराया, लेकिन इसी दौरान उनके सीने के बाईं ओर गोली लग गई। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि आतंकी पूरी तरह निष्क्रिय हो जाएं और किसी भी नागरिक या सैनिक को नुकसान न पहुंचे। बाद में उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी इस असाधारण वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।

अपने बेटे को याद करते हुए कर्नल चौधरी भावुक हो गए। उन्होंने कहा, "गर्व बहुत है, लेकिन दुख भी उतना ही गहरा है। जब माता-पिता अपने जवान बेटे को खो देते हैं, तो वह दर्द जिंदगी भर रहता है। फिर भी जब हमें उसकी बहादुरी की कहानियां उसके साथियों से सुनने को मिलती हैं, तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।"

कैप्टन चौधरी की मां, सत्य चौधरी ने भी खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा, "आज जब मुझे यह खबर मिली कि कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम मेरे बेटे के नाम पर रखा गया है, तो मुझे बहुत खुशी हुई। मैं केंद्र और राज्य सरकार दोनों का धन्यवाद करती हूं, और उन सभी लोगों का भी जिन्होंने इसके लिए आवाज उठाई। आज मुझे गर्व है कि मेरे बेटे का नाम पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा। भले ही वह हमारे साथ नहीं है, लेकिन उसका नाम हमेशा अमर रहेगा।"
 

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