भगवान शिव के इस मंदिर में विशेष अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है पोंगल, उमड़ता है भक्तों का जनसैलाब

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नई दिल्ली, 8 जनवरी (आईएएनएस)। उत्तर भारत में मकर संक्रांति तो दक्षिण भारत में पोंगल मनाया जाता है, जिसमें सूर्य की उपासना कर चावल का भोग लगाया जाता है।
इस बार पोंगल 14 जनवरी से शुरू होकर 17 जनवरी तक चलने वाला है। पोंगल पूरे दक्षिण भारत का मुख्य त्योहार है, लेकिन तमिलनाडु के तंजावुर में इसे विशेष प्रकार से मनाया जाता है। तंजावुर को चावल का कटोरा कहा जाता है, जहां मौजूद बृहदेश्वर मंदिर अपने आप में खास है।

तमिलनाडु के तंजावुर में बना बृहदेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित मंदिर है, लेकिन पोंगल के दिन मंदिर में भव्य आयोजन होता है। मंदिर को फूलों से सजाया जाता है और सुबह से लेकर रात तक मंदिर में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। भक्त सूर्य की उपासना के साथ-साथ चावल और गुड़ से बना भोज भगवान शिव को अर्पित करते हैं, और कुछ किसान भक्त मंदिर में नई फसलों के कुछ अंश को भगवान को चढ़ाते हैं।

दक्षिण भारत में पोंगल को फसल कटाई और सूर्य की उपासना से जोड़ा जाता है। चार दिन चलने वाले पोंगल में हर दिन मंदिर में विशेष पूजा पाठ होती है। पोंगल के मौके पर बृहदेश्वर मंदिर में भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए अनुष्ठान करते हैं और सारे पापों और रोगों से मुक्ति पाने की कामना करते हैं।

बृहदेश्वर मंदिर तंजावुर का सबसे प्राचीन मंदिर है, जिसकी वास्तुकला से लेकर शिल्पशैली लाजवाब है। मंदिर को सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया गया है। चोल सम्राट राजाराजा चोल प्रथम ने मंदिर का निर्माण कराया था, और मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट पत्थर से किया गया है। ये उस समय का पहला मंदिर है, जिसका निर्माण ग्रेनाइट पत्थर से किया गया है। तंजावुर के 100 किलोमीटर के दायरे तक में ग्रेनाइट पत्थर उपलब्ध नहीं है।

985-1012 ई. में पत्थर कहां से मंगाया गया, ये किसी को नहीं पता। बृहदेश्वर मंदिर कई मायनों में खास है, क्योंकि इस मंदिर की नींव नहीं है और इसे 16 फीट ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है। इसका गोपुरम 13 मंजिल का बना है और गोपुरम बनाने में बड़े ग्रेनाइट पत्थर का इस्तेमाल किया गया है, जिसका वजन तकरीबन 80 हजार किलोग्राम है। बताया जाता है कि मंदिर को बनाने में 7 साल लगे थे और मंदिर की दीवारों से लेकर गोपुरम तक पर द्रविड़ शैली की झलक देखने को मिलती है।

--आईएएनएस

पीएस/डीकेपी
 

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