नई दिल्ली, 29 जनवरी। वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और तेजी से बदलते टेक्नोलॉजी इनोवेशन के दौर में भारत के मौद्रिक और वित्तीय क्षेत्र ने वित्त वर्ष 26 (अप्रैल से दिसंबर 2025) में जोरदार प्रदर्शन किया है। यह जानकारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से गुरुवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में दी गई।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि अनिश्चितता से भरे इस दौर की चुनौतियों के समाधान के लिए नियामक नवाचार, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व महत्वपूर्ण हैं। सर्वेक्षण में आगे कहा गया कि घरेलू वित्त के लिए नए और समावेशी माध्यम आवश्यक हैं, क्योंकि ये वैश्विक वित्त की अस्थिरता से बचाव का कार्य करते हैं।
भारत का वित्तीय नियामक ढांचा मई 2025 में जारी आरबीआई के ऐतिहासिक नियामकों को स्पष्ट मान्यता देता है। यह फ्रेमवर्क एक पारदर्शी, परामर्शी और प्रभाव केंद्रित मौदिक प्रबंधन नियमन को संस्थागत करता है।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत का मौद्रिक प्रबंधन सामाजिक लक्ष्यों के साथ सूक्ष्म आर्थिक उद्देश्यों को संतुलित करता है। वित्तीय क्षेत्र नियमन की गुणवत्ता, आर्थिक सुदृढ़ता और सतत विकास के महत्वपूर्ण पहलू के रूप में उभरी है। दस्तावेज के अनुसार मूल्य स्थिरता बरकरार रखते हुए, वित्तीय स्थिरता को समर्थन और समावेशी विकास को बढ़ावा देते हुए मौद्रिक नीति देश के सतत विकास और आर्थिक समृद्धि के मुख्य पहलू के रूप में कार्य कर रही है।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि मुद्रास्फीति में नरमी को देखते हुए रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर में कमी और नकद जमा अनुपात (सीपीआर) में कमी कर ओपन मार्केट ऑपरेशंस (ओएमओ) के जरिए तरलता सुनिश्चित की है। इन कटौतियों का उद्देश्य क्रेडिट प्रवाह, निवेश और संपूर्ण आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना रहा। इसके अतिरिक्त, इन उपायों को प्रभावी रूप से ऋण दरों पर लागू किया।
वित्तवर्ष 2026 में आरबीआई तरलता प्रबंधन के जरिए बैंकिंग क्षेत्र में पर्याप्त तरलता सुनिश्चित करता रहा। इस पहल ने आर्थिक उत्पादकता आवश्यकताओं के अनुरूप मुद्रा और क्रेडिट मार्केट को प्रभावी बनाए रखा। पर्याप्त तरलता के बीच अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के ऋण और जमा दर में गतिशीलता जारी रही।