यादों में जयशंकर प्रसाद, आज भी प्रासंगिक 'कामायनी' के मनु और श्रद्धा?

यादों में जयशंकर प्रसाद: क्यों आज भी प्रासंगिक हैं 'कामायनी' के मनु और श्रद्धा?


नई दिल्ली, 29 जनवरी। यदि जयशंकर प्रसाद ने केवल 'कामायनी' ही लिखी होती, तब भी वे अमर रहते। 1936 में प्रकाशित यह महाकाव्य मनु (मानव) और श्रद्धा (भावना) की पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक मनुष्य के मानसिक अंतर्द्वंद्व की कहानी है। चिंता से शुरू होकर आनंद तक की यह यात्रा हमें सिखाती है कि बुद्धि और हृदय के समन्वय के बिना मनुष्य कभी पूर्ण नहीं हो सकता।

'प्रत्यभिज्ञा' और 'आनंदवाद' के दर्शन को उन्होंने इतने सरल और सुंदर छंदों में पिरोया कि आज भी यह महाकाव्य दुनिया भर के दार्शनिकों के लिए शोध का विषय है।

उन्होंने कई प्रसिद्ध नाटक और कहानियां लिखीं। जयशंकर प्रसाद का हिंदी साहित्य में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति, इतिहास और दर्शन को गहराई से बताया है। उनके कार्यों में प्रेम, सौंदर्य, त्याग, बलिदान और राष्ट्रभक्ति जैसे विषय प्रमुखता से उभरे हैं।

दरअसल, जयशंकर प्रसाद का जीवन किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 30 जनवरी 1889 को जन्मे प्रसाद जी का बचपन राजसी ठाट-बाट में बीता, लेकिन विधाता ने उनके लिए कठिन परीक्षा चुन रखी थी। जब वे मात्र 12 वर्ष के थे, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया। इसके बाद दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा कि मां और फिर बड़े भाई भी चल बसे।

किशोरावस्था की दहलीज पर खड़ा एक लड़का, जिसके कंधों पर अब न केवल पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी, बल्कि व्यापारिक ऋण का भारी बोझ भी था। स्कूल की पढ़ाई बीच में छूट गई, लेकिन उनके भीतर का 'साधु' जाग चुका था। उन्होंने घर की चारदीवारी को ही विश्वविद्यालय बना लिया। दिन भर व्यापार संभालते और रात की खामोशी में संस्कृत, उपनिषद, इतिहास और दर्शन के पन्नों से संवाद करते। यही वह तपस्या थी, जिसने एक व्यवसायी को 'महाकवि' में बदल दिया।

द्विवेदी युग की शुष्क और उपदेशात्मक कविताओं के बीच जब जयशंकर प्रसाद ने 'झरना' और 'आंसू' के स्वर छेड़े, तो हिंदी साहित्य की दुनिया चौंक उठी। उन्होंने कविता को केवल शब्दों का जोड़-तोड़ नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार बना दिया। वे 'पंत', 'निराला' और 'महादेवी' के साथ छायावाद के उस चतुर्भुज के केंद्र बने, जिसने हिंदी को आधुनिकता का नया लिबास पहनाया।

जयशंकर प्रसाद केवल कवि नहीं थे, वे इतिहास के चितेरे थे। उन्होंने देखा कि पराधीन भारत अपनी जड़ों को भूल रहा है। तब उन्होंने 'चन्द्रगुप्त', 'स्कन्दगुप्त' और 'अजातशत्रु' जैसे नाटकों के जरिए भारत के उस स्वर्णिम अतीत को पुनर्जीवित किया। जब रंगमंच पर चाणक्य जैसा पात्र गरजता है या कार्नेलिया गाती है, "अरुण यह मधुमय देश हमारा", तो हर भारतीय की रगों में देशभक्ति का लहू उबलने लगता है। 'ध्रुवस्वामिनी' के जरिए उन्होंने उस दौर में स्त्री-अधिकारों और पुनर्विवाह जैसे साहसी सवाल उठाए, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

जहां मुंशी प्रेमचंद समाज की सच्चाइयों को लिख रहे थे, वहीं जयशंकर प्रसाद ने अपनी कहानियों में 'भाव-प्रवणता' का रंग भरा। 'आकाशदीप', 'पुरस्कार' और 'ममता' जैसी कहानियां केवल किस्से नहीं हैं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, त्याग और करुणा के शिखर हैं। उनके उपन्यास 'कंकाल' में जहां वे समाज की कुरीतियों पर प्रहार करते हैं, वहीं 'तितली' में ग्रामीण आदर्शवाद की झलक दिखाते हैं।

15 नवंबर 1937 को मात्र 48 वर्ष की आयु में टीबी ने इस महान प्रतिभा को हमसे छीन लिया, लेकिन उनके शब्द आज भी काशी की हवाओं में गूंजते हैं।
 

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